ट्राइबल बिजनेस कॉन्क्लेव 2026: जनजातीय उद्यमिता को मिलेगा नया मंच भारत सरकार का जनजातीय कार्य मंत्रालय अब देश की जनजातीय प्रतिभाओं और स्टार्टअप्स को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। Startup India के सहयोग से शुरू किया गया “Tribal Business Conclave 2026 – Open Grand Challenge” देशभर के innovators और startups को tribal communities की समस्याओं के समाधान के लिए आमंत्रित कर रहा है। इस initiative का मुख्य उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका से जुड़ी चुनौतियों के लिए practical और technology-based solutions तैयार करना है। सरकार का मानना है कि innovation और entrepreneurship के माध्यम से tribal economy को मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। हेल्थ, एजुकेशन और आजीविका पर रहेगा फोकस इस grand challenge को तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया गया है: Tribal healthcare services को बेहतर बनाना Tribal students के लिए education और skill development solutions तैयार करना Tribal artisans, farmers और entrepreneurs की income बढ़ाने के लिए livelihood innovations विकसित करना सरकार विशेष रूप से ऐसे startups की तलाश में है जो remote tribal क्षेत्रों में scalable और sustainable मॉडल तैयार कर सकें। विजेताओं को मिलेंगे लाखों रुपये इस प्रतियोगिता में चयनित startups को कुल ₹12 लाख तक की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी। प्रथम पुरस्कार – ₹5 लाख द्वितीय पुरस्कार – ₹4 लाख तृतीय पुरस्कार – ₹3 लाख इसके अलावा mentorship, investor connect और national-level exposure जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जाएंगी। आवेदन प्रक्रिया शुरू Challenge के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इच्छुक startups Startup India portal के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की अंतिम तिथि 15 जून 2026 निर्धारित की गई है। Tribal Economy को मिलेगा बढ़ावा विशेषज्ञों के अनुसार यह conclave “Vocal for Local” और “Atmanirbhar Bharat” अभियान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे tribal products, handicrafts और local innovations को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। युवाओं के लिए बड़ा अवसर यह challenge विशेष रूप से उन युवाओं और startups के लिए बड़ा अवसर माना जा रहा है जो social impact और rural innovation के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं। सरकार को उम्मीद है कि इस initiative से tribal communities के जीवन स्तर में सुधार आएगा और नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
Mojtaba Khamenei: पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात किसी बारूद के ढेर से कम नहीं हैं। इस तनाव के बीच ईरान से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद, उनके 56 वर्षीय बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया 'सुप्रीम लीडर' (सर्वोच्च नेता) चुन लिया गया है। यह फैसला न केवल ईरान के भविष्य के लिए, बल्कि पूरी दुनिया की भू-राजनीति (Geopolitics) के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। यहाँ इस पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण दिया गया है: 1. चुनाव और सत्ता का हस्तांतरण ईरान की 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' ने मोजतबा खामेनेई के नाम पर मुहर लगाई है। मोजतबा के चुने जाने के पीछे सबसे बड़ी शक्ति ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेना के भारी दबाव के कारण ही असेंबली ने यह फैसला लिया। दिलचस्प बात यह है कि खुद अयातुल्ला अली खामेनेई ने पिछले साल अपने संभावित उत्तराधिकारियों की जो सूची बनाई थी, उसमें मोजतबा का नाम शामिल नहीं था। लेकिन इजरायल और अमेरिका के हालिया हमलों में अली खामेनेई की मौत के बाद स्थितियां तेजी से बदलीं और मोजतबा को नेतृत्व सौंपा गया। 2. कौन हैं मोजतबा खामेनेई? मोजतबा खामेनेई का जन्म 1969 में ईरान के माशहद शहर में हुआ था। वह उस दौर में पले-बढ़े जब उनके पिता शाह के शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे। बिना पद के प्रभाव: मोजतबा की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि उन्होंने कभी भी कोई आधिकारिक सरकारी पद नहीं संभाला। इसके बावजूद, उन्हें ईरान की सत्ता के गलियारों में सबसे ताकतवर व्यक्तियों में से एक माना जाता रहा है। युद्ध का अनुभव: उन्होंने ईरान-इराक युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लिया था। युद्ध के दौरान उनके परिवार के कई सदस्यों (पत्नी, बेटी, पोता आदि) की जान चली गई, लेकिन मोजतबा जीवित बचे रहे। सैन्य संबंध: उनके संबंध IRGC के साथ बहुत गहरे हैं। यही कारण है कि आज संकट की घड़ी में सेना ने उन पर भरोसा जताया है। 3. धार्मिक और राजनीतिक विवाद मोजतबा का चयन ईरान की स्थापित परंपराओं के खिलाफ माना जा रहा है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: वंशानुगत शासन का विरोध: 1979 की इस्लामी क्रांति का मूल आधार ही राजशाही और वंशवाद को खत्म करना था। ईरान खुद को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में पेश करता रहा है जहाँ योग्यता के आधार पर चयन होता है। अब पिता के बाद बेटे का चुना जाना इस विचारधारा पर सवाल उठाता है। धार्मिक योग्यता की कमी: ईरान के सर्वोच्च नेता के लिए 'उच्च पदस्थ धार्मिक विद्वान' होना अनिवार्य माना जाता है। मोजतबा के पास वह धार्मिक दर्जा नहीं है जो उनके पिता या उनसे पहले के नेताओं के पास था। 4. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और छवि साल 2019 में अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने मोजतबा पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप था कि मोजतबा बिना किसी चुनाव या नियुक्ति के अपने पिता के कार्यालय का कामकाज संभाल रहे थे और एक अघोषित शासक की तरह व्यवहार कर रहे थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें एक 'कट्टरपंथी' और 'पर्दे के पीछे से खेल खेलने वाला' नेता माना जाता रहा है। 5. पश्चिम एशिया पर प्रभाव मोजतबा के सर्वोच्च नेता बनते ही क्षेत्र में युद्ध की आहट तेज हो गई है। जवाबी हमले: अली खामेनेई की मौत का बदला लेने के लिए ईरान ने इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। कट्टर रुख: माना जा रहा है कि मोजतबा अपने पिता की तुलना में अधिक आक्रामक रुख अपना सकते हैं, जिससे इजरायल-ईरान संघर्ष एक पूर्ण युद्ध का रूप ले सकता है।
JASHEDPUR: ट्राइबल इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ( टिक्की ), झारखंड चैप्टर के द्वारा ट्राईबल कल्चर सेंटर, सोनारी में देश के दिग्गज उद्योगपति, आधुनिक भारत के निर्माता सह प्रेरणा स्रोत स्व: जेएन टाटा जी की 187वीं जयंती पर उनके आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पणकर श्रद्धांजलि दी गई. कार्यक्रम के दौरान काफी संख्या में टिक्की सदस्यगण मौजूद रहे. कार्यक्रम में टिक्की के प्रदेश अध्यक्ष वैद्यनाथ मांडी ने कहा कि स्व: टाटा जी आधुनिक भारत के निर्माता एवं प्रेरणा श्रोत हैl स्व: टाटा जी ने औद्योगिक क्रांति को एक नई जगह प्रदान की. प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों लोगों के लिए रोजगार के साधन बने. देश प्रेम की बात हो या सामाजिक सरोकार की दोनों में स्व: टाटा जी की सोच अव्वल रही. आदिवासी समाज उनके द्वारा किए गए अमूल्य कार्यों को कभी नहीं भूला सकती. कार्यक्रम में मुख्य रूप से बसंत तिर्की, राज मार्शल मार्डी, रंजन मार्डी, सुरेंद्र टुडू, चरण हांसदा, जोसेफ कांदिर, सौरव बेसरा,शंकर सेन महली,सूरज सोरेन, विजय गोंड, गगन सिंकू, विनोद माझी, गुलशन टुडू, बलराम सोरेन ,आकाश रंजन सोरेन,रामदास सोरेन इत्यादि मौजूद थे.
VEGETABLE MARKET :आज के समय में सब्जी की खेती केवल आजीविका का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह एक संगठित और लाभकारी कारोबार का रूप ले चुकी है। बढ़ती जनसंख्या, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और बाजार की बढ़ती मांग ने सब्जी उत्पादन को एक मजबूत व्यावसायिक क्षेत्र बना दिया है। छोटे किसान, युवा उद्यमी और महिलाएं भी अब सब्जी की खेती को नियमित व्यवसाय के रूप में अपनाने लगे हैं। पारंपरिक खेती से व्यावसायिक मॉडल तक पहले गांवों में सब्जियों की खेती मुख्य रूप से घरेलू जरूरतों की पूर्ति के लिए की जाती थी। किसान अपने खेत के एक छोटे हिस्से में मौसमी सब्जियां उगाते थे, ताकि परिवार की खपत के साथ-साथ स्थानीय हाट-बाजार में थोड़ी बहुत बिक्री हो सके। लेकिन वर्तमान समय में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब किसान बाजार की मांग को ध्यान में रखकर बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं। फसल चक्र, मौसम आधारित योजना, उन्नत बीजों का उपयोग और वैज्ञानिक सिंचाई पद्धति अपनाकर सब्जियों की खेती को एक व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे किसानों की आमदनी बढ़ी है और खेती को लेकर उनकी सोच भी पूरी तरह बदल गई है। तकनीक और आधुनिक संसाधनों की भूमिका सब्जी की खेती को कारोबार बनाने में तकनीक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। आज किसान ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिस्टम, मल्चिंग शीट, पॉलीहाउस और नेट हाउस जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। इन तकनीकों से फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन भी अधिक होता है। मोबाइल ऐप, कृषि पोर्टल और यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसान नई-नई जानकारियां प्राप्त कर रहे हैं। मिट्टी की जांच, मौसम पूर्वानुमान और रोग पहचान जैसी सुविधाएं भी तकनीक के जरिए आसान हो गई हैं। इससे खेती में होने वाला जोखिम कम हो रहा है और किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। बाजार, मांग और सप्लाई चेन की ताकत सब्जियों की मांग हर मौसम में बनी रहती है, क्योंकि यह रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा हैं। होटल, ढाबा, रेस्टोरेंट, शादी-ब्याह के आयोजन, स्कूल और अस्पताल जैसी जगहों पर सब्जियों की नियमित आपूर्ति की आवश्यकता होती है। इस कारण सब्जी की खेती एक निरंतर मांग वाला व्यवसाय बन चुकी है। आज किसान सीधे मंडियों के अलावा थोक विक्रेताओं, सब्जी व्यापारियों और ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म से भी जुड़ रहे हैं। कई जगहों पर किसान उत्पादक संगठन (FPO) बनाकर सामूहिक रूप से अपनी उपज बेच रहे हैं, जिससे उन्हें बेहतर कीमत मिल रही है। कोल्ड स्टोरेज और परिवहन सुविधाओं के विकास से भी सब्जियों की मार्केटिंग आसान हुई है। रोजगार और छोटे उद्यमिता के नए अवसर सब्जी की खेती ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के कई नए अवसर पैदा किए हैं। नर्सरी तैयार करना, रोपाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, पैकिंग और परिवहन जैसे कार्यों के लिए बड़ी संख्या में श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। इससे गांवों में ही लोगों को काम मिलने लगा है और शहरों की ओर होने वाला पलायन कुछ हद तक कम हुआ है। युवा वर्ग अब सब्जी की खेती को स्टार्टअप की तरह देख रहा है। कई युवा ऑर्गेनिक सब्जी उत्पादन, हाईटेक नर्सरी, सीधा ग्राहक तक डिलीवरी जैसी नई सोच के साथ इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। महिलाएं भी स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सब्जी उत्पादन और विपणन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं हालांकि सब्जी की खेती एक लाभकारी कारोबार बन चुकी है, लेकिन इसमें कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। मौसम का असंतुलन, कीट-रोगों का प्रकोप, बीज और खाद की बढ़ती लागत तथा बाजार में दामों का उतार-चढ़ाव किसानों के लिए बड़ी समस्या है। कई बार अच्छी पैदावार के बावजूद उचित कीमत नहीं मिल पाने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। इसके बावजूद भविष्य की संभावनाएं काफी उज्ज्वल दिख रही हैं। जैविक (ऑर्गेनिक) सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में सीधे किसान से सब्जी खरीदने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। अगर सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर योजनाबद्ध तरीके से काम करें, तो सब्जी की खेती आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकती है और इसे एक सफल और टिकाऊ कारोबार के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
JAMSHEDPUR:बालीगुमा स्थित करम अखड़ा में रविवार को बृहद झारखंड कला-संस्कृति मंच की ओर से डहरे टुसू-2026 की तैयारी को लेकर एक बैठक स्वतंत्रता सेनानी शहीद रघुनाथ महतो के वंशज भूपेन महतो की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. भूपेन महतो ने बताया कि इस बार भी डिमना चौक से लेकर साकची आमबागान मैदान तक भव्य डहरे टुसू पर्व शोभायात्रा निकाली जायेगी. इसमें पटमदा, बोड़ाम, मुसाबनी, घाटशिला, चाकुलिया, बहरागोड़ा समेत कोल्हान के विभिन्न गांवों से हजारों की संख्या में डहरे टुसू पर्व में शामिल होंगे. डहरे टुडू पर्व के बहाने कुड़मी समाज के लोग अपनी एकता को प्रदर्शित करेंगे. उन्होंने बताया कि डहरे टुसू पर्व शोभायात्रा में अनूठी झांकी निकाली जायेगी. जो कुड़मी समाज की गौरवमयी इतिहास पर आधारित होगी. शोभायात्रा दल में छऊ नृत्य आकर्षण का केंद्र बनेगा. झांकी में एक हजार नगाड़ा वादक पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होंगे और नगाड़ा की थाप पर शहर वासियों को झूमने के मजबूर कर देंगे. वहीं पीली साड़ी में 2 हजार से अधिक कलाकार डिमना से आमबागान चौक के बीच लाइव परफॉमेंश देंगे. वे नगाड़ा व मांदर के साथ पर नृत्य की प्रस्तुति देंगे. बृहद झारखंड कला-संस्कृति मंच के दीपक रंजीत ने कहा कि डहरे टुसू का आयोजन सुदूर गांव देहातों में होता आ रहा है. लेकिन शहर में इसका आयोजन कर इसकी महत्ता से अन्य समाज व समुदाय को भी अवगत कराया जायेगा. कुड़मी समाज की संस्कृति को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है. बैठक में पटमदा, बोडाम, डिमना समेत अन्य जगहों से कुड़मी समाज के कई लोग शामिल हुए.
झारखंड के कई जिलों में पिछुआ हवाओं के कारण ठंड में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के अनुसार, पिछुआ हवाएं उत्तर से उत्तर-पश्चिम दिशा से चल रही हैं, जिनके कारण न्यूनतम तापमान में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आई है। राजधानी रांची सहित आसपास के क्षेत्रों में सुबह का तापमान करीब 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास है, जिससे सुबह के समय काफी ठंडक बढ़ गई है। इस वर्ष सर्दी ने अपनी दस्तक समय से पहले दे दी है, क्योंकि मौसम विभाग ने पहले ही नवंबर के अंत से ठंड बढ़ने की चेतावनी दी थी। रातों में तापमान करीब 9 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे पूरे क्षेत्र में ठंड का असर महसूस किया जा रहा है। राज्य के अधिकांश जिलों में मंगलवार को मौसम साफ और शुष्क रहा और मध्यम तेजी से हवा चली, जिससे ठंडी हवा का अनुभव हुआ। पिछले 24 घंटों में गोड्डा जिले में अधिकतम तापमान 28.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि गुमला में न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ। रांची में अधिकतम तापमान 24.6 और न्यूनतम 11.1 डिग्री सेल्सियस रहा। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को सलाह दी है कि इस ठंड में फसलों की सुरक्षा के लिए सिंचाई का विशेष ख्याल रखा जाए ताकि वे प्रभावित न हों। मौसम विभाग ने सूचना दी है कि बंगाल की खाड़ी में दबाव का क्षेत्र बन रहा है, जिससे चक्रवात बनने की संभावना है। यह चक्रवात झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों के मौसम पर असर डाल सकता है। इस कारण अगले दो दिनों में तापमान में और गिरावट आने की संभावना है और बारिश या तेज हवाओं के चलते खेल आयोजन प्रभावित हो सकता है।राजधानी रांची सहित अन्य जिलों में पछुआ हवाओं के कारण कनकनी बढ़ गई है, जिससे सुबह और शाम की ठंड अधिक महसूस होती है।
Adivasi food: झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में पाई जाने वाली यह परंपरा संथाल, हो, ओरांव और मुंडा जैसे आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। जंगलों से गहरा रिश्ता रखने वाले ये समुदाय प्राकृतिक संसाधनों को भोजन और औषधि के रूप में उपयोग करते आए हैं। सर्दियों के मौसम में यह पारंपरिक खाद्य पदार्थ पारिवारिक भोज का विशेष हिस्सा बन जाता है और इसे प्यार से “जंगल का तोहफा” कहा जाता है। यह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलित जीवनशैली का प्रतीक भी है। ओडिशा में इसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिल चुका है, जिससे इसकी विशिष्टता और पारंपरिक महत्व को आधिकारिक मान्यता मिलती है। सेहत का प्राकृतिक कवच: ठंड से लेकर इम्युनिटी तक सर्दियों में इसका सेवन शरीर को अंदर से गर्म रखता है और ठंड व सर्दी-जुकाम से बचाव में सहायक माना जाता है। यह भूख बढ़ाने में भी मदद करती है, जिससे शरीर को भरपूर पोषण मिलता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है। इसके नियमित सेवन से हड्डियाँ और मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, जिससे शारीरिक कमजोरी दूर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पारंपरिक घरेलू औषधि के रूप में भी अपनाया जाता है, खासकर बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए। रोगों से लड़ने में सहायक और बढ़ती लोकप्रियता आदिवासी समाज में यह धारणा प्रचलित है कि यह प्राकृतिक खाद्य पदार्थ कई तरह की बीमारियों में राहत पहुँचा सकता है। कोरोना, मलेरिया, पीलिया, बुखार, एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में इसे सहायक माना जाता है। परंपरागत विश्वासों के अनुसार, चींटियों के काटने से होने वाले बुखार में भी यह लाभकारी हो सकता है। इसके अलावा, वजन बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत करने और शरीर को डिटॉक्स करने में इसकी भूमिका बताई जाती है। आजकल शहरी क्षेत्रों में भी लोग इसे स्वास्थ्यवर्धक सुपरफूड के रूप में अपनाने लगे हैं, जिससे यह ग्रामीण और आदिवासी सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक पहचान बना रहा है।
FILM FESTIVAL: श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के प्रेक्षागृह में सोमवार को झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव – 2025 (छठा संस्करण) का शुभारंभ बेहद गरिमामय और उत्साहपूर्ण वातावरण में हुआ। फ़िल्म और कला जगत से जुड़े अनेक गणमान्यों की उपस्थिति ने उद्घाटन समारोह को खास बना दिया। मुख्य अतिथि के रूप में आदित्यपुर नगर निगम की उपनगर आयुक्त परुल सिंह तथा सह मुख्य अतिथि के रूप में श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के कुलपति सुखदेव महतो ने समारोह की शोभा बढ़ाई। विशिष्ट सम्मानित अतिथियों में डॉ. जे.एन. दास,डॉ ज्योति सिंह, पूरबी घोष, पवन कुमार साव, चंचल भाटिया, नेहा तिवार, ज्योति सेनापति, पूर्व वार्ड पार्षद नीतू शर्मा शामिल रहे। समारोह की शुरुआत परिचय और स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। इसके बाद सांस्कृतिक टीम द्वारा प्रस्तुत आकर्षक स्वागत नृत्य ने मंच का माहौल जीवंत कर दिया। JNFF के संस्थापक संजय सतपथी और राजू मित्रा ने स्वागत भाषण में महोत्सव की यात्रा, उद्देश्य और झारखंड में फ़िल्म संस्कृति के विस्तार पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथियों एवं विशिष्ट अतिथियों को पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया। सभी मान्यवरों ने अपने प्रेरक संबोधन से कार्यक्रम की गरिमा को नई ऊँचाई दी। मंचीय कार्यक्रम के दौरान लोकप्रिय शॉर्ट फ़िल्म “Silk Coffin” की विशेष स्क्रीनिंग की गई, जिसे दर्शकों ने विशेष प्रशंसा दी। महोत्सव को सफल बनाने में संस्थापकों के साथ-साथ क्रिएटिव डायरेक्टर शिवांगी सिंह,डॉ. शालिनी प्रसाद का रचनात्मक नेतृत्व अत्यंत प्रभावी रहा। झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 08 से 13 दिसंबर तक आयोजित होगा। 09 से 12 दिसंबर तक विभिन्न श्रेणियों की फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, जबकि 13 दिसंबर को समापन एवं पुरस्कार समारोह (Award Night) XLRI, जमशेदपुर में होगा।
जमशेदपुर: राज्यभर के झारखंड आंदोलनकारी सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं. इसी मुद्दे को लेकर ‘झारखंड आंदोलनकारी सेनानी समन्वय आह्वान’ ने 22 नवंबर को बाबा तिलका माझी क्लब, फुलडुंगरी, घाटशिला में एक बैठक बुलाया गया है. आयोजन समिति के प्रो. श्याम मुर्मू, संतोष सोरेन, आदित्य प्रधान, सुराई बास्के व अजीत तिर्की ने संयुक्त रूप से बताया कि वर्तमान सामाजिक सुरक्षा नीति सीमित होने के कारण हजारों आंदोलनकारी विशेषकर वे जो जेल नहीं गये थे, पर आंदोलन में उनका सक्रिय भूमिका रहा है. लेकिन वे आज भी पेंशन, स्वास्थ्य सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित है. इस स्थिति में अब एक मजबूत संयुक्त मंच की आवश्यकता महसूस की जा रही है. ताकि आंदोलन मजबूती के साथ अपनी मांगों को सरकार के सामने रख सके. उन्होंने सभी आंदोलनकारियों से अपील किया है कि वे उक्त बैठक में आवश्यक रूप से भाग ले. ये हैं प्रमुख मांगें -सभी आंदोलनकारियों को समान सामाजिक सुरक्षा एवं प्रशस्ति पत्र दिया जाये -पेंशन में उचित वृद्धि तथा नियमित भुगतान किया जाये -आंदोलनकारियों को स्वास्थ्य बीमा की सुविधा प्रदान की जाये -आंदोलनकारियों के आश्रितों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता दिया जाये -झारखंड आंदोलनकारी संग्रहालय सह स्मारक का निर्माण कराया जाये -झारखंड आंदोलनकारी आयोग का पुनर्गठन किया जाये
जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में बुधवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का समापन हुआ. इस पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन शाम को नागपुरी, संताली और जनजातीय लोकगीतों की गूंज के साथ पूरा मैदान झूम उठा. देश के विभिन्न राज्यों से आये कलाकारों ने अपने लोक संगीत और नृत्य से जनजातीय संस्कृति की विविधता का परिचय कराया. नागपुरी गायक अर्जुन लकड़ा और गायिका गरिमा एक्का ने संवाद अखड़ा मंच को संभाला. जैसे ही अर्जुन लकड़ा संवाद अखड़ा मंच पर पहुंचे, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. दर्शकों ने उनकी पसंदीदा गीतों की फरमाइश शुरू कर दी. लकड़ा ने अपने ट्रेडिंग गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को जोश से भर दिया. उनका गायकी का अंदाज और स्टेज कवरिंग शैली दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर रही थी. इसके बाद संताली गायिका कल्पना हांसदा ने अपनी मधुर आवाज में पारंपरिक व मॉडर्न गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लिया. उनके गीतों की धुन पर युवाओं ने मैदान में समूह बनाकर नृत्य किया. रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने एक-दूसरे का हाथ थाम लोकनृत्य की लय पर झूमकर ट्राइबल संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी. जनजातीय संगीत पर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग और युवा उपस्थित थे. हर गीत, हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही. युवाओं ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर इस सांस्कृतिक माहौल को कैद किया. सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आये कलाकारों ने भी अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी. संवाद अखड़ा के मंच पर इन कलाकारों ने लोकनृत्य, पुनर्जीवित रिवाजों और जनजातीय संगीत के सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम समापन की यह शाम सांस्कृतिक विविधता का उत्सव बना. लौहनगरी जमशेदपुर की धरती पर कलाकारों ने एकता और कला के नये रंग भी बिखेरा. स्टॉलों से एक करोड़ से अधिकार का हुआ कारोबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में जनजातीय व्यंजनों के स्टॉल समेत कला और हस्तशिल्प व पारंपरिक उपचार के स्टॉल्स के कई स्टॉल भी लगाये थे. जहां शहर समेत कोल्हान के विभिन्न जगहों से आये लोगों ने जमकर खरीदारी भी की. टीएसएफ के रिपोर्ट के मुताबिक इसबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में एक करोड़ से अधिक का कारोबार हुआ है. इससे यह बात साबित होती है कि जनजातीय समाज की वस्तुएं अब ब्रांड बन चुकी हैं. जिसे आदिवासी ही नहीं अन्य समाज व समुदाय के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं. संवाद फेलोशिप के लिए नौ फेलो का किया चयन टाटा स्टील फाउंडेशन ने संवाद फेलोशिप 2025 के लिए 9 फेलो के चयन की भी घोषणा की. इनका चयन 572 आवेदनों में से किया गया, जो 25 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 122 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जिनमें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों से 10 आवेदक शामिल थे. फाउंडेशन ने पिछली कई फेलोशिप परियोजनाओं के पूरा होने का भी जश्न मनाया.