PREMSHILA HANSDAH: संताली फिल्म जगत के लिए एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। पार्श्व गायिका प्रेमशिला हांसदा का असामयिक निधन हो गया है। उनके चले जाने से न केवल संताली सिनेमा, बल्कि पूरे क्षेत्रीय कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रेमशिला हांसदा अपनी मधुर और जादुई आवाज के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने कई लोकप्रिय संताली एलबमों और फिल्मों में अपनी गायकी का लोहा मनवाया। अपनी अद्वितीय कला के दम पर उन्होंने झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य आदिवासी बहुल राज्यों में अपनी एक खास पहचान बनाई थी। इतनी कम उम्र में उनके निधन ने प्रशंसकों और साथी कलाकारों को झकझोर कर रख दिया है। सिने जगत के कलाकारों और उनके चाहने वालों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए ईश्वर और 'मरांगबुरू से प्रार्थना की है कि उनकी पुण्यात्मा को अपने चरणों में स्थान दें। सोशल मीडिया पर भी लोग उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रेमशिला का जाना संताली संगीत के एक सुनहरे युग की अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई आने वाले समय में नामुमकिन होगी। उनकी आवाज हमेशा उनके गीतों के माध्यम से जीवित रहेगी।
JAMSHEDPUR: आज के इस हाई-टेक और एआई के दौर में जहां दुनिया की कई भाषाएं लुप्त हो रही हैं, वहीं जमशेदपुर का एक 76 वर्षीय बुजुर्ग 45 सालों से अपनी मातृभाषा की मशाल जलाए हुए है. हम बात कर रहे हैं बारीडीह माझी टोला निवासी शंकर सोरेन की. जो लोग उम्र को महज एक आंकड़ा मानते हैं, उनके लिए शंकर सोरेन एक जीवंत मिसाल हैं. 76 साल की उम्र में भी उनका अनुशासन और जज्बा किसी 25 साल के ऊर्जावान युवक जैसा है. शंकर सोरेन की दिनचर्या आज भी किसी मिशनरी की तरह है. वे सुबह एक ठोस वर्क प्लान के साथ जागते हैं और रात को सोने से पहले अगले दिन की कार्ययोजना पूरी करके ही चैन की सांस लेते हैं. उनके शब्दकोश में आराम शब्द के लिए कोई जगह नहीं है. वे मानते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए काम करना ही जीवन है. शंकर सोरेन बड़े गर्व से कहते हैं कि मातृभाषा मां के दूध के समान है. यह उन्हें समाज में सिर उठाकर जीने के योग्य बनाती है. अपनी पहचान बचानी है, तो अपनी भाषा को बचाना ही होगा. लोगों से 2-2 रुपये चंदे लेकर साईकिल से डोर टू डोर करते थे प्रचार-प्रसार शंकर सोरेन बताते हैं कि मातृभाषा संताली के प्रचार-प्रसार के लिए वे लोगों से 2-2 रुपये की सहयोग राशि मांगते थे. इस छोटी सी राशि और बड़े हौसले के दम पर उनकी टीम ने संताली भाषा को पूरे कोल्हान में घर-घर तक पहुंचाया. शंकर सोरेन याद करते हैं कि कैसे वे और उनकी करीब 60 लोगों की टीम साइकिल पर सवार होकर पूरे कोल्हान का दौरा करती थी. घर-घर जाकर लोगों को संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के प्रति जागरूक करना उनका मुख्य उद्देश्य था. उसी मुहिम के क्रम में शंकर सोरेन पिछले 10 वर्षों से आसेका झारखंड के महासचिव के रूप में योगदान दे रहे हैं. वे लगातार मातृभाषा संताली को एक नयी ऊंचाई देने का काम कर रहे हैं. वे बताते हैं उनके नेतृत्व में आसेका के बैनर तले हर साल लगभग 5000 लोग संताली भाषा में परीक्षा देते हैं. अब तक 50 हजार से अधिक लोग इस परीक्षा का हिस्सा बन चुके हैं. इस मुहिम की सबसे सुखद तस्वीर यह है कि परीक्षा देने वाले 5000 छात्रों में से लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं होती हैं. जो एक बड़े सामाजिक बदलाव है. क्योंकि यदि एक महिला शिक्षित होती है और अपनी मातृभाषा सीखती है, तो वह पूरी पीढ़ी को अपनी संस्कृति और पहचान से जोड़ देती है. पंडित रघुनाथ मुर्मू से मातृभाषा को बचाने की मिली प्रेरणा शंकर सोरेन के इस जुनून के पीछे एक ऐतिहासिक घटना है. वे बताते हैं कि 1963 में बहरागोड़ा के कुटूसोल गांव में ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू आये थे. उस समय शंकर की उम्र मात्र 12 साल थी. पंडित मुर्मू जिस तरह ब्लैक बोर्ड पर तस्वीरें बनाकर संताली लिपि सिखा रहे थे. उससे वे काफी प्रभावित हुए और आज तक उनके मन पर गहरी छाप है. उसी दिन वे उनके अनुयायी बन गये और यह संकल्प लिया कि जीवन के अंतिम समय तक अपनी मातृभाषा की सेवा करेंगे. नौकरी के साथ सामाजिक सेवा में बनायी अलग पहचान शंकर सोरेन के सफर की शुरुआत 1972 में हुई, जब महज 22 साल की उम्र में उन्होंने एलआईसी में क्लर्क के रूप में नौकरी ज्वाइन की थी. बाद में वे एलआईसी ऑफिस जमशेदपुर में डेवलपमेंट ऑफिसर बने और 2010 में सेवानिवृत्त हुए. लेकिन उनकी असली पहचान नौकरी से इतर उनकी सामाजिक सक्रियता रही. 1978 में जब जमशेदपुर के टिनप्लेट के पास सामाजिक व शैक्षणिक संगठन आसेका का कार्यालय बना, तो शंकर सोरेन इसके सबसे सक्रिय सिपाही बनकर उभरे.
JAMSHEDPUR: फागुन में जब सखुआ के पेड़ों पर नई कोपलें और सुनहरे फूल लदने लगते हैं, तो यह आदिवासी समाज के लिए प्रकृति के नये वर्ष और बाहा महापर्व के आगमन का संकेत होता है.तब आदिवासी समाज अपने सबसे पवित्र पर्व बाहा के स्वागत में झूम उठता है. शनिवार को कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान में कुछ ऐसा ही नजारा दिखा, जहां पारंपरिक गीतों की गूंज और मांदर की थाप ने पूरे वातावरण को बाहामय कर दिया. प्रकृति और मनुष्य के अटूट रिश्ते को दर्शाते इस पर्व में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा. श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर 'ओत डिगिर-डिगिर हाले सेरमा बारांग-बारांग' नुकिन दो जाहेर आयो- जा गोसांय, माघ बोंगा पोलोमेन फागुन सेटेरेन- फागुन सांवते बाहा बोंगा ताबोन मुलू:एन, बाहा बोंगा पुयलू माहा बोंगा बुरू उम नड़का को - जैसे पारंपरिक गीतों पर नृत्य किया. इन गीतों के माध्यम से श्रद्धालुओं ने न केवल नृत्य-गाकर आनंद लिया, बल्कि पहाड़, नदी, झरने और वनों के प्रति आभार व्यक्त किया. क्योंकि आदिवासियों के लिए ये केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात देवी-देवताओं के स्वरूप हैं. जाहेरथान में माझी बाबा बिंदे सोरेन, कमेटी के अध्यक्ष भुआ हांसदा और पारानिक बाबा सुरेंद्र टुडू की अगुवाई में पारंपरिक रीति-रिवाज से विधिवत पूजा-अर्चना की गयी. नायके बाबा ने जब सखुआ के फूल (सरजोम बाहा) वितरित किया, तो महिलाओं ने बड़ी श्रद्धा से उन्हें अपने आंचल में ग्रहण किया और जूड़े में खोंसा, वहीं पुरुषों ने इसे अपने कानों पर सजाया. पूजा के बाद दिसुआ ग्रामीणों ने जिस उत्साह के साथ बाहा उत्सव मनाया, उसने आधुनिकता के दौर में भी अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का संदेश दिया. कदमा जाहेरथान में आयोजित बाहा पर्व में बारीडीह, करनडीह, गोविंदपुर, आदित्यपुर, मानगो, बालीगुमा, डिमना, रानीडीह, मतलाडीह, सुंदरनगर, खुकड़ाडीह, हलुदबनी, सरजामदा, गदड़ा समेत शहर के आसपास के विभिन्न गांवों से सैकड़ों लोग पहुंचे थे. कदमा बाहा पर्व को सफल बनाने में कमेटी के संरक्षक लक्ष्मण टुडू, महासचिव भीम मुर्मू, पंचु हांसदा, बिक्रम बास्के, विकास हेंब्रम, चंद्रो टुडू,सुरेंद्र नाथ मुर्मू, सुनाराम टुडू, जितराय टुडू, लीलमोहन सोरेन,सोनाराम सोरेन, लक्ष्मण मरांडी, महेंद्र मुर्मू, छोटूराम के अलावा अन्य ने योगदान दिया. नृत्य की दिशा में छिपा है ब्रह्मांड का रहस्य आदिवासियों का प्रकृति प्रेम महज प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भी है. पर्व के दौरान जब ग्रामीण मांदर और नगाड़े की थाप पर थिरके, तो उनकी नृत्य शैली में एक दर्शन दिखा. आदिवासी समाज हमेशा एंटी-क्लॉकवाइज (दाएं से बाएं) दिशा में घूमकर नृत्य करता है. इसके पीछे मान्यता है कि प्रकृति की तमाम लताएं और बेलें हमेशा दायें से बायें की ओर ही बढ़ती हैं. यह नृत्य इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज प्रकृति की गति के साथ तालमेल बिठाकर चलता है और उससे अलग होकर अपना अस्तित्व नहीं मानता. प्रकृति का संरक्षण ही मानव जीवन का आधार: माझी बाबा बाहा पर्व के शुभ अवसर पर कदमा जाहेरथान में माझी बाबा बिंदे सोरेन ने समाज को प्रकृति संरक्षण का एक गहरा संदेश दिया. उन्होंने कहा कि बाहा पर्व हमें यह सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं. जिस प्रकार प्रकृति हमें बिना मांगे जीवन की हर आवश्यक वस्तु-हवा, पानी और फल-फूल प्रदान करती है, उसी प्रकार हमारा भी यह परम दायित्व है कि हम पूरी निष्ठा से उसका संरक्षण करें. माझी बाबा ने कहा कि आदिवासी संस्कृति की जड़ें प्रकृति में ही रची-बसी हैं. बिना प्रकृति के संरक्षण के मानव जीवन की कल्पना करना असंभव है. बाहा पर्व केवल उत्सव मात्र नही है, बल्कि जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार जताने और उन्हें सहेजने का संकल्प है.
ADIVASI DUNIYA : आदिवासी होना केवल एक पहचान या प्रमाण-पत्र का विषय नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवनदर्शन है। आदिवासियत प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, सामूहिकता, सादगी और संतुलन की सीख देती है। हमारे पूर्वजों ने जंगल, जल, जमीन और पर्वतों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवंत सत्ता माना। जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर रस्म, हर परंपरा और हर उत्सव इसी जीवनदर्शन से जुड़ा है। आदिवासी संस्कृति हमें सिखाती है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका रक्षक है। इसी मूल भाव को जीवित रखना हमारी असली पहचान है। आदि संस्कृति: पूजा-पद्धति नहीं, जीवनशैली आदि संस्कृति किसी एक विशेष पूजन-पद्धति तक सीमित नहीं है। यह हमारी दिनचर्या, हमारे रिश्ते, हमारे गीत-संगीत, नृत्य, पर्व-त्योहार और सामाजिक व्यवस्था में रची-बसी है। सिंगबोगा, दिरि-दारू, बुरू-गाड़ा, ओते-हासा जैसे पवित्र स्थल और जाहेर ऐरा, मरंग बुरू, देशाउलि जैसी आस्थाएँ हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। ये प्रतीक हमें याद दिलाते हैं कि जीवन का हर क्षण पवित्र है और हर कर्म का प्रकृति पर प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हमारी परंपराएँ संतुलन और सामंजस्य का मार्ग दिखाती हैं। स्वेच्छा से घर वापसी: खुले दिल और खुले द्वार जो आदिवासी भाई-बहन किसी भी कारणवश अन्य धर्मों में चले गए थे, उनके लिए आज घर के द्वार खुले हैं। यह आह्वान किसी दबाव या विरोध का नहीं, बल्कि आत्मीयता और अपनत्व का है। “घर वापसी” का अर्थ है-अपनी जड़ों से पुनः जुड़ना, अपनी भाषा, परंपरा और सामूहिक पहचान को फिर से अपनाना। यह प्रक्रिया स्वेच्छा, सम्मान और संवाद पर आधारित है। समाज का यह संदेश स्पष्ट है कि हर परिवार का स्वागत खुले दिल से किया जाएगा, बिना किसी भेदभाव के। बदलती परिस्थितियां: सहयोग, शिक्षा और अवसर यह सच है कि बीते वर्षों में आदिवासी समाज ने अनेक कठिनाइयाँ झेली हैं—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर। इन्हीं चुनौतियों के कारण कई परिवारों ने कठिन निर्णय लिए। आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। समाज के भीतर सहयोग की नई संरचनाएँ बन रही हैं। शिक्षा के अवसर बढ़ रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुधर रही है और रोजगार के नए मार्ग खुल रहे हैं। सामूहिक प्रयासों से समस्याओं का समाधान खोजा जा रहा है। यह विश्वास मजबूत हो रहा है कि आदिवासी समाज अपने हर सदस्य के साथ खड़ा है। धरती आबा का मार्ग: आत्मसम्मान और स्वाधीनता धरती आबा बिरसा मुंडा ने बाहरी प्रभुत्व और सांस्कृतिक विघटन का विरोध इसलिए किया था, क्योंकि वे जानते थे कि जड़ों से कटकर कोई समाज मजबूत नहीं रह सकता। उनका संघर्ष आत्मसम्मान, स्वाधीनता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक है। आज उनके दिखाए मार्ग पर चलना केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा देना है। “घर वापसी” उसी चेतना का विस्तार है—जहाँ आदिवासी परिवार अपनी मूल संस्कृति में लौटकर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं।
Santhali Cinema : संताली सिनेमा उद्योग से जुड़े कलाकार किसी भी प्रकार की बड़ी सरकारी सहायता के बिना वर्षों से अपनी मातृभाषा में निरंतर फिल्में बना रहे हैं। यह काम केवल व्यवसाय के लिए नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को जीवित रखने के लिए किया जा रहा है। सीमित संसाधनों, कम बजट और कई तकनीकी दिक्कतों के बावजूद कलाकार, निर्देशक, लेखक और संगीतकार पूरे समर्पण के साथ काम कर रहे हैं। गांवों, कस्बों और दूर-दराज के क्षेत्रों में शूटिंग करना, प्राकृतिक लोकेशन का उपयोग करना और सीमित साधनों में बेहतर परिणाम लाना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। यह उद्योग संघर्षों से भरा जरूर है, लेकिन कलाकारों का जज्बा हर मुश्किल से बड़ा दिखाई देता है। पहचान की उम्मीद और बॉलीवुड जैसा सपना संताली फिल्म उद्योग से जुड़े लगभग हर अभिनेता, अभिनेत्री और तकनीशियन के मन में यह विश्वास गहराई से बैठा है कि आज नहीं तो कल, उनकी फिल्मों को भी बॉलीवुड की तरह देशभर में पहचान जरूर मिलेगी। यह सपना सिर्फ चमक-दमक का नहीं, बल्कि अपनी भाषा को सम्मान दिलाने का है। कलाकार मानते हैं कि जिस तरह मराठी, भोजपुरी, बंगाली और दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों ने अपनी जगह बनाई है, उसी तरह संताली सिनेमा भी धीरे-धीरे राष्ट्रीय फलक पर उभरेगा। कई युवा कलाकार इस सपने को लेकर पूरी ईमानदारी से काम कर रहे हैं, अभिनय की नई तकनीकें सीख रहे हैं और अपने स्तर पर गुणवत्ता सुधारने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। यही सकारात्मक सोच संताली सिनेमा की सबसे बड़ी पूंजी बन चुकी है। सिनेमा घरों की कमी, सोशल मीडिया बना सबसे बड़ा सहारा वर्तमान समय में संताली फिल्मों को दिखाने वाले सिनेमा घरों की संख्या बेहद कम है। कई जिलों में तो एक भी ऐसा थिएटर नहीं है, जहां नियमित रूप से संताली फिल्में प्रदर्शित हो सकें। इस कमी ने जरूर फिल्म उद्योग को चुनौती दी है, लेकिन कलाकारों और निर्माताओं ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने संताली फिल्मों और म्यूजिक एलबमों के लिए नया बाजार खोल दिया है। अब फिल्में और गाने सीधे दर्शकों के मोबाइल तक पहुंच रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म की वजह से संताली फिल्मों का बिजनेस पूरी तरह से ऑनलाइन आधारित हो गया है और विज्ञापन, व्यूज व सब्सक्रिप्शन के जरिए कमाई का नया रास्ता तैयार हुआ है। मजबूत हौसले, एकजुटता और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद संताली फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों का हौसला आज भी उतना ही मजबूत है, जितना शुरुआती दौर में था। चुनौतियों के बावजूद वे लगातार नई कहानियां लिख रहे हैं, नए विषयों पर फिल्में बना रहे हैं और अपनी कला को निखारने में लगे हुए हैं। यह उद्योग अब केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि एक आंदोलन का रूप ले चुका है, जो भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए चल रहा है। कलाकारों के बीच आपसी सहयोग, टीम वर्क और एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की भावना भी काफी मजबूत हुई है। आने वाले समय में यदि सरकारी और निजी स्तर पर थोड़ा और सहयोग मिला, तो संताली सिनेमा निश्चित रूप से एक नई ऊंचाई को छुएगा। आज जिस जज्बे के साथ यह उद्योग आगे बढ़ रहा है, वह साफ संकेत देता है कि संताली सिनेमा का भविष्य उज्ज्वल है और यह अपनी अलग पहचान जरूर बनाएगा।
Huru Bandi :सुदूर गांवों और देहाती इलाकों में धान की कटाई के बाद उसे सुरक्षित रखने की एक पुरानी और विश्वसनीय पद्धति ‘बिटा’ बनाने की रही है। समय के साथ अब यह परंपरा धीरे-धीरे बदलती जा रही है और उसकी जगह आधुनिक तरीके, जैसे बोरा, प्लास्टिक बैग और गोदामों में भंडारण, ले रहे हैं। यह बदलाव जहां सुविधा और समय की बचत लेकर आया है, वहीं पारंपरिक ज्ञान के लुप्त होने की चिंता भी बढ़ा रहा है। बिटा’ बनाने की पारंपरिक विधि और उसका महत्व धान कटनी के बाद खेत या आंगन में गोलाकार ढेर बनाकर ऊपर से सूखी पुआल और घास से ढक देने की व्यवस्था को ‘बिटा’ कहा जाता है। यह व्यवस्था खासतौर पर झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित रही है। बिटा को इस तरह बनाया जाता था कि बारिश का पानी अंदर न जाए और हवा का संचार बना रहे। नीचे की ज़मीन को पहले साफ कर हल्की ऊंचाई दी जाती थी ताकि नमी से धान खराब न हो। इस पारंपरिक संरचना का सबसे बड़ा लाभ यह था कि धान लंबे समय तक सुरक्षित रहता था और कीड़े-मकोड़ों से भी काफी हद तक बचा रहता था। परिवार के सभी सदस्य मिलकर बिटा बनाते थे, जिससे यह एक सामूहिक श्रम और सामाजिक उत्सव का रूप ले लेता था। यह न केवल भंडारण की तकनीक थी, बल्कि ग्रामीण जीवन की सामूहिक संस्कृति का प्रतीक भी थी। आधुनिक दौर में बोरों का बढ़ता चलन वर्तमान समय में गांवों में भी तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। अब अधिकतर किसान धान को बोरे, प्लास्टिक की बोरियां या पॉलीबैग में भरकर रखते हैं। कुछ जगहों पर सरकारी या निजी गोदामों का भी उपयोग होने लगा है। इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं, जैसे मजदूरों की कमी, समय की बचत, बाजार तक तेजी से पहुंच और परिवहन की सुविधा। बोरों में रखे धान को ट्रैक्टर, पिकअप या ट्रकों में लादकर मंडी तक ले जाना काफी आसान हो गया है। पहले जहां बिटा से धान निकालने और भरने में समय लगता था, वहीं अब कटनी के तुरंत बाद धान बोरे में भर दिया जाता है। इससे किसानों को आर्थिक रूप से त्वरित लाभ मिलने लगा है। हालांकि, प्लास्टिक बोरियों में नमी जमा होने से कई बार धान खराब होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन की जरूरत ग्रामीण क्षेत्रों के बुजुर्ग किसान आज भी मानते हैं कि बिटा प्रणाली प्राकृतिक रूप से अधिक सुरक्षित और टिकाऊ थी। उनका कहना है कि बिटा में रखा धान ज्यादा महीनों तक सुरक्षित रहता था और उसका स्वाद व गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती थी। वहीं युवा पीढ़ी सुविधा और समय को प्राथमिकता देते हुए आधुनिक तरीकों को अपनाने में अधिक रुचि दिखा रही है।
Ho Samaj : करनडीह दुखूटोला में सोमवार को सरजा़ेेम युवा फाउंडेशन की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता संगठन के अध्यक्ष सागर हेंब्रम ने की। बैठक में आदिवासी हो समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। उपस्थित सदस्यों ने समाज की प्रगति और एकता को मजबूत करने के विभिन्न उपायों पर चर्चा की। सभी ने यह संकल्प भी लिया कि समाज के विकास के लिए सामूहिक रूप से काम करेंगे और एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। इस दौरान समाज में शिक्षा के बढ़ते महत्व पर विशेष जोर दिया गया और जागरूकता फैलाने की अपील की गई। समाज के विकास के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प मौके पर सागर हेंब्रम ने कहा कि समाज का वास्तविक उत्थान केवल शिक्षा से ही संभव है। उन्होंने बताया कि हर माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाएं, ताकि वे भविष्य में हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। नई पीढ़ी के शिक्षित होने से न केवल परिवार बल्कि संपूर्ण समाज को लाभ मिलेगा। उन्होंने सभी ग्रामीणों से अनुरोध किया कि वे बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करें और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक सहयोग दें। इस बैठक में मानकी हेंब्रम, रजनी दोराई, फूलो सावैयां, संगीता बोदरा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और समाज के विकास के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प लिया।
Tribal lifestyle आधुनिक भागदौड़ और उपभोक्तावादी जीवनशैली के बीच आदिवासी समाज की सरल, संतुलित और प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली आज पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बनती जा रही है। सदियों से जंगल, पहाड़, नदी और जमीन से जुड़ी उनकी परंपराएँ न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। आज जरूरत इस बात की है कि आदिवासी जीवनशैली के मूल्यों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाया जाए। प्रकृति के साथ सामंजस्य का जीवन दर्शन आदिवासी समुदाय हमेशा से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता के रूप में देखते आए हैं। पेड़ काटने से पहले पूजा, नदी और पहाड़ों को देवता के समान मानने की परंपरा उनके गहरे पर्यावरणीय चेतना को दर्शाती है। वे जरूरत भर का ही उपभोग करने में विश्वास रखते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बना रहता है। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही है, तब आदिवासी समाज की यह सोच अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। सामूहिकता और समानता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था आदिवासी जीवनशैली की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी सामूहिक जीवन व्यवस्था। गांव के हर व्यक्ति को समान सम्मान देने की परंपरा, मिल-जुलकर काम करना और सुख-दुःख में साथ खड़े रहना उनकी पहचान है। उनके समाज में प्रतियोगिता से अधिक सहयोग की भावना देखने को मिलती है। विवाह, त्योहार, खेती और सामुदायिक कार्यक्रमों में पूरा गांव एक परिवार की तरह भागीदारी निभाता है। आज के समय में जब समाज तेजी से व्यक्तिगत स्वार्थ की ओर बढ़ रहा है, तब आदिवासी समुदाय का यह सामूहिक दृष्टिकोण समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। सरल जीवन, उच्च विचार का व्यावहारिक उदाहरण आदिवासी समाज “कम में संतोष” की भावना को अपने जीवन में सहज रूप से अपनाता है। साधारण वस्त्र, स्थानीय भोजन और प्राकृतिक औषधियों के प्रयोग से वे तन और मन दोनों को स्वस्थ रखते हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ से दूर रहकर वे मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं। आज के शहरी जीवन में बढ़ता तनाव, अवसाद और अकेलापन इस बात का प्रमाण है कि समाज को फिर से सादगी और संतुलन की ओर लौटने की जरूरत है, जैसा कि आदिवासी समाज सदियों से करता आ रहा है। आधुनिक समाज के लिए सीख और अपनाने की जरूरत विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर आधुनिक समाज आदिवासी जीवनशैली के मूल तत्वों को अपनाए, तो कई सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान संभव है। जल संरक्षण, वनों की रक्षा, जैविक खेती और सामुदायिक सहयोग जैसे सिद्धांत आज की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। जरूरत इस बात की है कि नीति-निर्माता, शिक्षण संस्थान और समाज के जागरूक वर्ग इस जीवनदृष्टि को केवल सराहें ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में भी शामिल करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित और स्वस्थ संसार मिल सके।
Adivasi food: झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में पाई जाने वाली यह परंपरा संथाल, हो, ओरांव और मुंडा जैसे आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। जंगलों से गहरा रिश्ता रखने वाले ये समुदाय प्राकृतिक संसाधनों को भोजन और औषधि के रूप में उपयोग करते आए हैं। सर्दियों के मौसम में यह पारंपरिक खाद्य पदार्थ पारिवारिक भोज का विशेष हिस्सा बन जाता है और इसे प्यार से “जंगल का तोहफा” कहा जाता है। यह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलित जीवनशैली का प्रतीक भी है। ओडिशा में इसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिल चुका है, जिससे इसकी विशिष्टता और पारंपरिक महत्व को आधिकारिक मान्यता मिलती है। सेहत का प्राकृतिक कवच: ठंड से लेकर इम्युनिटी तक सर्दियों में इसका सेवन शरीर को अंदर से गर्म रखता है और ठंड व सर्दी-जुकाम से बचाव में सहायक माना जाता है। यह भूख बढ़ाने में भी मदद करती है, जिससे शरीर को भरपूर पोषण मिलता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है। इसके नियमित सेवन से हड्डियाँ और मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, जिससे शारीरिक कमजोरी दूर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पारंपरिक घरेलू औषधि के रूप में भी अपनाया जाता है, खासकर बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए। रोगों से लड़ने में सहायक और बढ़ती लोकप्रियता आदिवासी समाज में यह धारणा प्रचलित है कि यह प्राकृतिक खाद्य पदार्थ कई तरह की बीमारियों में राहत पहुँचा सकता है। कोरोना, मलेरिया, पीलिया, बुखार, एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में इसे सहायक माना जाता है। परंपरागत विश्वासों के अनुसार, चींटियों के काटने से होने वाले बुखार में भी यह लाभकारी हो सकता है। इसके अलावा, वजन बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत करने और शरीर को डिटॉक्स करने में इसकी भूमिका बताई जाती है। आजकल शहरी क्षेत्रों में भी लोग इसे स्वास्थ्यवर्धक सुपरफूड के रूप में अपनाने लगे हैं, जिससे यह ग्रामीण और आदिवासी सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक पहचान बना रहा है।
संताली समुदाय की गौरवपूर्ण विरासत ओलचिकी लिपि की रचना को 100 वर्ष पूरे होने पर इस वर्ष शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इसका आगाज़ 22 दिसंबर को संताली भाषा दिवस के उपलक्ष्य में झारखंड, बंगाल, असम, ओडिशा सहित कई राज्यों में किया जाएगा। ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन के महासचिव रवींद्रनाथ मुर्मू ने बताया कि यह आयोजन संताली भाषा और लिपि की सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने का प्रयास है। 23 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के चंद्रकोना स्थित रवींद्र भवन में शताब्दी कार्यक्रम का आयोजन होगा, जिसमें साहित्य और संस्कृति से जुड़े प्रमुख लोग शामिल होंगे। पूर्वोत्तर, ओडिशा और झारखंड में विशेष आयोजन 24 दिसंबर को असम के कोकराझार के काचुगांव स्थित एनएन ब्रह्मा सीनियर सेकेंडरी स्कूल परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया है। इसके अगले दिन 25 दिसंबर को ओडिशा के बारीपदा में ओलचिकी लिपि पर आधारित विविध साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। 26 दिसंबर को पश्चिम सिंहभूम के चाईबासा में शताब्दी समारोह का एक महत्वपूर्ण आयोजन होगा। इसी दिन पूर्वी सिंहभूम के करनडीह स्थित दिशोम जाहेर कैंपस में आदिवासी पुस्तक मेला व आदिवासी लघु फिल्म महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें कई राज्यों के आदिवासी पुस्तक विक्रेता और देशभर से चयनित फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी। साहित्यिक गोष्ठी, नारी चेतना और समापन समारोह 27 दिसंबर को दिशोम जाहेर कैंपस में नारी चेतना कार्यक्रम एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा, जिसमें महिलाओं की भूमिका, साहित्य और समाज में योगदान पर विशेष विचार-विमर्श होगा। 28 दिसंबर को ओलचिकी और संताली साहित्य पर राष्ट्रीय गोष्ठी आयोजित की जाएगी, जिसमें विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकार अपने विचार और शोध प्रस्तुत करेंगे। शताब्दी समारोह का समापन 29 दिसंबर को होगा, जिसमें भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगी। इस ऐतिहासिक अवसर पर वह संताली भाषा, साहित्य और लिपि के संरक्षण एवं संवर्धन में योगदान देने वाले 100 व्यक्तियों को सम्मानित भी करेंगी। यह समारोह संताली समुदाय की सांस्कृतिक अस्मिता को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने का प्रतीक है। एक नजर में कार्यक्रम की जानकारी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह में संताली भाषा साहित्य व लिपि की सेवा कर रहे 100 लोगों को सम्मानित करेंगी 8 दिवसीय ओलचिकी लिपि शताब्दी वर्ष का आगाज 22 दिसंबर को संताली भाषा दिवस समारोह के साथ होगा करनडीह दिशोम जाहेर कैंपस में 26 से 28 दिसंबर तक होगा आदिवासी पुस्तक मेला देशभर के संताली साहित्यकार, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी व स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख समारोह में शामिल होंगे आदिवासी लघु फिल्म महोत्सव 26 को, देशभर से आये चयनित फिल्मों को प्रदर्शित किया जायेगा
जमशेदपुर: अपने जीवन में 79वीं बार रक्तदान करने वाले और रक्तदान को अपना मिशन बनाने वाले जमशेदपुर के ट्राइबल ब्लड मैन के नाम से चर्चित राजेश मार्डी की जीवनी पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म का सातवें बारीपदा नेशनल इंडिजीनस शॉट फिल्म फेस्टिवल 2025 में इंट्री मिला. यह फिल्म फेस्टिवल बारीपदा के शहीद स्मृति भवन में 13 व 14 दिसंबर को रंगारंग सतरंगी कार्यक्रम के बीच होगा. ट्राइबल ब्लड मैन राजेश मार्डी के नाम से संताली भाषा में बनी इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म को गोमहेड़ ऊमुल प्रोडक्शन के बैनर तले बनाया गया है. इसके निर्माता सुशील मुर्मू व निर्देशिक किरण माझी है. कैमरामैन के रूप में सूरज मुर्मू व उदय हेम्ब्रम, संपादन जयंत बास्के व राजेश टुडू ने किया है. इसमें म्यूजिक जयंत बास्के की है. इस फिल्म फेस्टिवल में झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, दिल्ली, तमिलनाडु, आसाम सहित कई अन्य जगहों की शॉट फिल्म व डॉक्यूमेंट्री फिल्म को शामिल किया गया है. राजेश मार्डी की इस उपलब्धि पर जमशेदपुर ब्लड सेंटर के जीएम संजय चौधरी समेत उनके प्रशंसकों व नई जिंदगी परिवार के सभी सदस्यों ने उन्हें बधाई दी है.
जमशेदपुर: बारीडीह चौक में बिरसा सेना के केंद्रीय अध्यक्ष दिनकर कच्छप की अगुवाई में वीर शहीद कोंका करमाली को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी गयी है. संगठन के सदस्यों व स्थानीय युवाओं ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया. श्री कच्छप ने कहा कि आदिवासी-मूलवासी समाज के लोगों को अपने महापुरूषों के इतिहास को जानने व समझने का प्रयास करना चाहिए. उन्होंने जल, जंगल व जमीन की बचाये रखने के लिए आंदोलन कर अपने प्राणों की आहुति दी. लेकिन वर्तमान समय में आदिवासी-मूलवासियों का जमीन सुरक्षित नहीं है. उन्हें उनके जमीन से बेदखल किया जा रहा है. इसलिए अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए तमाम आदिवासी व मूलवासी को एकजुट होने की जरूरत है. इस अवसर पर गोपाल लोहार, अनमोल पात्रो, अंकित कुमार, अंता टुडू, समीर पाड़ेया, अखिल कच्छप, भीम राज कच्छप, ऋतिक बोयपाई, पृथ्वी सामद, राजा पूर्ति, अजय लोहार, राजू कर्मकार, महावीर लोहार, अरविंद मुखी समेत अन्य मौजूद थे.
जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में बुधवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का समापन हुआ. इस पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन शाम को नागपुरी, संताली और जनजातीय लोकगीतों की गूंज के साथ पूरा मैदान झूम उठा. देश के विभिन्न राज्यों से आये कलाकारों ने अपने लोक संगीत और नृत्य से जनजातीय संस्कृति की विविधता का परिचय कराया. नागपुरी गायक अर्जुन लकड़ा और गायिका गरिमा एक्का ने संवाद अखड़ा मंच को संभाला. जैसे ही अर्जुन लकड़ा संवाद अखड़ा मंच पर पहुंचे, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. दर्शकों ने उनकी पसंदीदा गीतों की फरमाइश शुरू कर दी. लकड़ा ने अपने ट्रेडिंग गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को जोश से भर दिया. उनका गायकी का अंदाज और स्टेज कवरिंग शैली दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर रही थी. इसके बाद संताली गायिका कल्पना हांसदा ने अपनी मधुर आवाज में पारंपरिक व मॉडर्न गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लिया. उनके गीतों की धुन पर युवाओं ने मैदान में समूह बनाकर नृत्य किया. रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने एक-दूसरे का हाथ थाम लोकनृत्य की लय पर झूमकर ट्राइबल संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी. जनजातीय संगीत पर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग और युवा उपस्थित थे. हर गीत, हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही. युवाओं ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर इस सांस्कृतिक माहौल को कैद किया. सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आये कलाकारों ने भी अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी. संवाद अखड़ा के मंच पर इन कलाकारों ने लोकनृत्य, पुनर्जीवित रिवाजों और जनजातीय संगीत के सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम समापन की यह शाम सांस्कृतिक विविधता का उत्सव बना. लौहनगरी जमशेदपुर की धरती पर कलाकारों ने एकता और कला के नये रंग भी बिखेरा. स्टॉलों से एक करोड़ से अधिकार का हुआ कारोबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में जनजातीय व्यंजनों के स्टॉल समेत कला और हस्तशिल्प व पारंपरिक उपचार के स्टॉल्स के कई स्टॉल भी लगाये थे. जहां शहर समेत कोल्हान के विभिन्न जगहों से आये लोगों ने जमकर खरीदारी भी की. टीएसएफ के रिपोर्ट के मुताबिक इसबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में एक करोड़ से अधिक का कारोबार हुआ है. इससे यह बात साबित होती है कि जनजातीय समाज की वस्तुएं अब ब्रांड बन चुकी हैं. जिसे आदिवासी ही नहीं अन्य समाज व समुदाय के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं. संवाद फेलोशिप के लिए नौ फेलो का किया चयन टाटा स्टील फाउंडेशन ने संवाद फेलोशिप 2025 के लिए 9 फेलो के चयन की भी घोषणा की. इनका चयन 572 आवेदनों में से किया गया, जो 25 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 122 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जिनमें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों से 10 आवेदक शामिल थे. फाउंडेशन ने पिछली कई फेलोशिप परियोजनाओं के पूरा होने का भी जश्न मनाया.
झारखंड के कई जिलों में पिछुआ हवाओं के कारण ठंड में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के अनुसार, पिछुआ हवाएं उत्तर से उत्तर-पश्चिम दिशा से चल रही हैं, जिनके कारण न्यूनतम तापमान में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आई है। राजधानी रांची सहित आसपास के क्षेत्रों में सुबह का तापमान करीब 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास है, जिससे सुबह के समय काफी ठंडक बढ़ गई है। इस वर्ष सर्दी ने अपनी दस्तक समय से पहले दे दी है, क्योंकि मौसम विभाग ने पहले ही नवंबर के अंत से ठंड बढ़ने की चेतावनी दी थी। रातों में तापमान करीब 9 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे पूरे क्षेत्र में ठंड का असर महसूस किया जा रहा है। राज्य के अधिकांश जिलों में मंगलवार को मौसम साफ और शुष्क रहा और मध्यम तेजी से हवा चली, जिससे ठंडी हवा का अनुभव हुआ। पिछले 24 घंटों में गोड्डा जिले में अधिकतम तापमान 28.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि गुमला में न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ। रांची में अधिकतम तापमान 24.6 और न्यूनतम 11.1 डिग्री सेल्सियस रहा। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को सलाह दी है कि इस ठंड में फसलों की सुरक्षा के लिए सिंचाई का विशेष ख्याल रखा जाए ताकि वे प्रभावित न हों। मौसम विभाग ने सूचना दी है कि बंगाल की खाड़ी में दबाव का क्षेत्र बन रहा है, जिससे चक्रवात बनने की संभावना है। यह चक्रवात झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों के मौसम पर असर डाल सकता है। इस कारण अगले दो दिनों में तापमान में और गिरावट आने की संभावना है और बारिश या तेज हवाओं के चलते खेल आयोजन प्रभावित हो सकता है।राजधानी रांची सहित अन्य जिलों में पछुआ हवाओं के कारण कनकनी बढ़ गई है, जिससे सुबह और शाम की ठंड अधिक महसूस होती है।
Adivasi food: झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में पाई जाने वाली यह परंपरा संथाल, हो, ओरांव और मुंडा जैसे आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। जंगलों से गहरा रिश्ता रखने वाले ये समुदाय प्राकृतिक संसाधनों को भोजन और औषधि के रूप में उपयोग करते आए हैं। सर्दियों के मौसम में यह पारंपरिक खाद्य पदार्थ पारिवारिक भोज का विशेष हिस्सा बन जाता है और इसे प्यार से “जंगल का तोहफा” कहा जाता है। यह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलित जीवनशैली का प्रतीक भी है। ओडिशा में इसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिल चुका है, जिससे इसकी विशिष्टता और पारंपरिक महत्व को आधिकारिक मान्यता मिलती है। सेहत का प्राकृतिक कवच: ठंड से लेकर इम्युनिटी तक सर्दियों में इसका सेवन शरीर को अंदर से गर्म रखता है और ठंड व सर्दी-जुकाम से बचाव में सहायक माना जाता है। यह भूख बढ़ाने में भी मदद करती है, जिससे शरीर को भरपूर पोषण मिलता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है। इसके नियमित सेवन से हड्डियाँ और मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, जिससे शारीरिक कमजोरी दूर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पारंपरिक घरेलू औषधि के रूप में भी अपनाया जाता है, खासकर बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए। रोगों से लड़ने में सहायक और बढ़ती लोकप्रियता आदिवासी समाज में यह धारणा प्रचलित है कि यह प्राकृतिक खाद्य पदार्थ कई तरह की बीमारियों में राहत पहुँचा सकता है। कोरोना, मलेरिया, पीलिया, बुखार, एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में इसे सहायक माना जाता है। परंपरागत विश्वासों के अनुसार, चींटियों के काटने से होने वाले बुखार में भी यह लाभकारी हो सकता है। इसके अलावा, वजन बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत करने और शरीर को डिटॉक्स करने में इसकी भूमिका बताई जाती है। आजकल शहरी क्षेत्रों में भी लोग इसे स्वास्थ्यवर्धक सुपरफूड के रूप में अपनाने लगे हैं, जिससे यह ग्रामीण और आदिवासी सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक पहचान बना रहा है।
FILM FESTIVAL: श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के प्रेक्षागृह में सोमवार को झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव – 2025 (छठा संस्करण) का शुभारंभ बेहद गरिमामय और उत्साहपूर्ण वातावरण में हुआ। फ़िल्म और कला जगत से जुड़े अनेक गणमान्यों की उपस्थिति ने उद्घाटन समारोह को खास बना दिया। मुख्य अतिथि के रूप में आदित्यपुर नगर निगम की उपनगर आयुक्त परुल सिंह तथा सह मुख्य अतिथि के रूप में श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के कुलपति सुखदेव महतो ने समारोह की शोभा बढ़ाई। विशिष्ट सम्मानित अतिथियों में डॉ. जे.एन. दास,डॉ ज्योति सिंह, पूरबी घोष, पवन कुमार साव, चंचल भाटिया, नेहा तिवार, ज्योति सेनापति, पूर्व वार्ड पार्षद नीतू शर्मा शामिल रहे। समारोह की शुरुआत परिचय और स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। इसके बाद सांस्कृतिक टीम द्वारा प्रस्तुत आकर्षक स्वागत नृत्य ने मंच का माहौल जीवंत कर दिया। JNFF के संस्थापक संजय सतपथी और राजू मित्रा ने स्वागत भाषण में महोत्सव की यात्रा, उद्देश्य और झारखंड में फ़िल्म संस्कृति के विस्तार पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथियों एवं विशिष्ट अतिथियों को पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया। सभी मान्यवरों ने अपने प्रेरक संबोधन से कार्यक्रम की गरिमा को नई ऊँचाई दी। मंचीय कार्यक्रम के दौरान लोकप्रिय शॉर्ट फ़िल्म “Silk Coffin” की विशेष स्क्रीनिंग की गई, जिसे दर्शकों ने विशेष प्रशंसा दी। महोत्सव को सफल बनाने में संस्थापकों के साथ-साथ क्रिएटिव डायरेक्टर शिवांगी सिंह,डॉ. शालिनी प्रसाद का रचनात्मक नेतृत्व अत्यंत प्रभावी रहा। झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 08 से 13 दिसंबर तक आयोजित होगा। 09 से 12 दिसंबर तक विभिन्न श्रेणियों की फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, जबकि 13 दिसंबर को समापन एवं पुरस्कार समारोह (Award Night) XLRI, जमशेदपुर में होगा।
जमशेदपुर: राज्यभर के झारखंड आंदोलनकारी सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं. इसी मुद्दे को लेकर ‘झारखंड आंदोलनकारी सेनानी समन्वय आह्वान’ ने 22 नवंबर को बाबा तिलका माझी क्लब, फुलडुंगरी, घाटशिला में एक बैठक बुलाया गया है. आयोजन समिति के प्रो. श्याम मुर्मू, संतोष सोरेन, आदित्य प्रधान, सुराई बास्के व अजीत तिर्की ने संयुक्त रूप से बताया कि वर्तमान सामाजिक सुरक्षा नीति सीमित होने के कारण हजारों आंदोलनकारी विशेषकर वे जो जेल नहीं गये थे, पर आंदोलन में उनका सक्रिय भूमिका रहा है. लेकिन वे आज भी पेंशन, स्वास्थ्य सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित है. इस स्थिति में अब एक मजबूत संयुक्त मंच की आवश्यकता महसूस की जा रही है. ताकि आंदोलन मजबूती के साथ अपनी मांगों को सरकार के सामने रख सके. उन्होंने सभी आंदोलनकारियों से अपील किया है कि वे उक्त बैठक में आवश्यक रूप से भाग ले. ये हैं प्रमुख मांगें -सभी आंदोलनकारियों को समान सामाजिक सुरक्षा एवं प्रशस्ति पत्र दिया जाये -पेंशन में उचित वृद्धि तथा नियमित भुगतान किया जाये -आंदोलनकारियों को स्वास्थ्य बीमा की सुविधा प्रदान की जाये -आंदोलनकारियों के आश्रितों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता दिया जाये -झारखंड आंदोलनकारी संग्रहालय सह स्मारक का निर्माण कराया जाये -झारखंड आंदोलनकारी आयोग का पुनर्गठन किया जाये
जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में बुधवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का समापन हुआ. इस पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन शाम को नागपुरी, संताली और जनजातीय लोकगीतों की गूंज के साथ पूरा मैदान झूम उठा. देश के विभिन्न राज्यों से आये कलाकारों ने अपने लोक संगीत और नृत्य से जनजातीय संस्कृति की विविधता का परिचय कराया. नागपुरी गायक अर्जुन लकड़ा और गायिका गरिमा एक्का ने संवाद अखड़ा मंच को संभाला. जैसे ही अर्जुन लकड़ा संवाद अखड़ा मंच पर पहुंचे, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. दर्शकों ने उनकी पसंदीदा गीतों की फरमाइश शुरू कर दी. लकड़ा ने अपने ट्रेडिंग गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को जोश से भर दिया. उनका गायकी का अंदाज और स्टेज कवरिंग शैली दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर रही थी. इसके बाद संताली गायिका कल्पना हांसदा ने अपनी मधुर आवाज में पारंपरिक व मॉडर्न गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लिया. उनके गीतों की धुन पर युवाओं ने मैदान में समूह बनाकर नृत्य किया. रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने एक-दूसरे का हाथ थाम लोकनृत्य की लय पर झूमकर ट्राइबल संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी. जनजातीय संगीत पर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग और युवा उपस्थित थे. हर गीत, हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही. युवाओं ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर इस सांस्कृतिक माहौल को कैद किया. सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आये कलाकारों ने भी अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी. संवाद अखड़ा के मंच पर इन कलाकारों ने लोकनृत्य, पुनर्जीवित रिवाजों और जनजातीय संगीत के सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम समापन की यह शाम सांस्कृतिक विविधता का उत्सव बना. लौहनगरी जमशेदपुर की धरती पर कलाकारों ने एकता और कला के नये रंग भी बिखेरा. स्टॉलों से एक करोड़ से अधिकार का हुआ कारोबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में जनजातीय व्यंजनों के स्टॉल समेत कला और हस्तशिल्प व पारंपरिक उपचार के स्टॉल्स के कई स्टॉल भी लगाये थे. जहां शहर समेत कोल्हान के विभिन्न जगहों से आये लोगों ने जमकर खरीदारी भी की. टीएसएफ के रिपोर्ट के मुताबिक इसबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में एक करोड़ से अधिक का कारोबार हुआ है. इससे यह बात साबित होती है कि जनजातीय समाज की वस्तुएं अब ब्रांड बन चुकी हैं. जिसे आदिवासी ही नहीं अन्य समाज व समुदाय के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं. संवाद फेलोशिप के लिए नौ फेलो का किया चयन टाटा स्टील फाउंडेशन ने संवाद फेलोशिप 2025 के लिए 9 फेलो के चयन की भी घोषणा की. इनका चयन 572 आवेदनों में से किया गया, जो 25 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 122 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जिनमें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों से 10 आवेदक शामिल थे. फाउंडेशन ने पिछली कई फेलोशिप परियोजनाओं के पूरा होने का भी जश्न मनाया.