झारखंड

लौहनगरी जमशेदपुर में ब्राउन शुगर का बढ़ता जाल, युवा पीढ़ी सबसे अधिक प्रभावित

JAMSHEDPUR : लौहनगरी जमशेदपुर, जो कभी अपनी औद्योगिक पहचान, अनुशासन और सांस्कृतिक विविधता के लिए जानी जाती थी, आज एक गंभीर सामाजिक संकट से जूझ रही है। हाल के दिनों में शहर में ब्राउन शुगर का प्रचलन जिस तेजी से बढ़ा है, उसने आम लोगों के साथ-साथ अभिभावकों और समाजसेवियों की चिंता बढ़ा दी है। यह नशा अब केवल वयस्कों या सीमित क्षेत्रों तक सिमटा नहीं रह गया है, बल्कि कम उम्र के बच्चे और किशोर भी इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं। स्कूल-कॉलेज जाने वाले युवा, जो देश और समाज का भविष्य माने जाते हैं, नशे के इस दलदल में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। पहले जहां चोरी-छुपे कुछ इलाकों में इसका सेवन होता था, वहीं अब यह हर गली-मोहल्ले में खुलेआम फैल चुका है। हर बस्ती तक पहुंचा नशे का कारोबार शहर के बस्ती इलाकों से लेकर मुख्य बाजारों और सार्वजनिक स्थानों तक ब्राउन शुगर का नेटवर्क फैल चुका है। नशे के कारोबारी युवाओं की कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें धीरे-धीरे इसकी लत लगा रहे हैं। शुरुआत में इसे मौज-मस्ती या तनाव दूर करने का साधन बताकर परोसा जाता है, लेकिन कुछ ही समय में युवक इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब दिन के उजाले में भी नशे की खरीद-बिक्री हो रही है। कई इलाकों में बच्चों का व्यवहार बदल गया है, वे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं और अपराध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इससे न केवल परिवार टूट रहे हैं, बल्कि पूरे समाज की सामाजिक संरचना भी कमजोर हो रही है। अपराध और सामाजिक विघटन का कारण बनता नशा ब्राउन शुगर की लत केवल स्वास्थ्य के लिए ही घातक नहीं है, बल्कि यह अपराध को भी जन्म दे रही है। नशे की पूर्ति के लिए युवा चोरी, छिनतई और अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। इससे शहर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी असर पड़ रहा है। कई मामलों में नशे के कारण पारिवारिक हिंसा, मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। चिकित्सकों का कहना है कि ब्राउन शुगर शरीर और मस्तिष्क दोनों को तेजी से नुकसान पहुंचाती है। इसका सेवन करने वाले युवाओं में अवसाद, चिड़चिड़ापन और हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। सरकार और प्रशासन से ठोस पहल की मांग इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार और प्रशासन की भूमिका बेहद अहम है। समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि केवल छापेमारी या गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए व्यापक रणनीति अपनाने की जरूरत है। नशे के कारोबारियों पर कड़ी कार्रवाई के साथ-साथ युवाओं के पुनर्वास और काउंसलिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाकर बच्चों को नशे के दुष्परिणामों के बारे में बताया जाना चाहिए। साथ ही, खेल, कला और रोजगार से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देकर युवाओं को सकारात्मक दिशा में जोड़ा जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस लड़ाई को गंभीरता से लड़ें। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह नशा आने वाले वर्षों में शहर की पूरी पीढ़ी को खोखला कर देगा। युवाओं को इस दलदल से बाहर निकालना केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

Khoboriya दिसम्बर 16, 2025 0
ठंड शुरु होते ही दलमा तराई में गूंज उठी "रस गुड़"की खुशबू

DALMA HILL: जमशेदपुर से सटे दलमा पहाड़ी के तराई क्षेत्र में बसे कई गांव—जैसे कालाजाना, लुपुंगडीह, खोर्काई, आसनबनी और आसपास के टोले—में ठंड उतरते ही एक जीवंत परंपरा जाग उठती है। यह परंपरा है खजूर के पेड़ों से रस निकालकर गुड़ बनाने की। स्थानीय ग्रामीण इसे न सिर्फ रोज़गार का एक प्रमुख साधन मानते हैं, बल्कि इसे अपनी संस्कृति और पहचान का भी अहम हिस्सा मानते हैं। नवंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी तक इन गांवों के कई परिवार सुबह-सुबह उठकर खजूर पेड़ों पर चढ़ते हैं और ‘दऊड़ी’ लगाते हैं। दऊड़ी यानी लकड़ी की छोटी नली, जिसे पेड़ पर हल्का सा चीरा लगा कर बांधा जाता है ताकि रातभर में पेड़ से मिठास भरा रस ‘ताड़ी’ के रूप में टपककर मिट्टी या स्टील के बर्तनों में जमा हो सके। सूर्योदय तक इकट्ठा हुआ रस ताज़ा और गाढ़ा होता है, जिसे उसी सुबह गुड़ बनाने की प्रक्रिया में भेज दिया जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि यह काम पीढ़ियों से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। कई बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि कैसे उनके पूर्वज इसी रस और गुड़ की कमाई से परिवार चलाते थे। आज भी यह परंपरा आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बीच अपनी मिठास बनाए हुए है। मेहनत भरा लेकिन आनंददायक है गुड़ बनाने का काम रस इकट्ठा होने के बाद असली मेहनत शुरू होती है। गांवों में खुले चूल्हे पर बड़े-बड़े कड़ाहे चढ़ाए जाते हैं। उनमें सुबह का ताज़ा रस डालकर लगातार कई घंटों तक पकाया जाता है। चूल्हे की आग को तेज़ रखने के लिए सूखी लकड़ी, पुआल और झाड़ियों का इस्तेमाल होता है। रस को लगातार चलाया जाता है ताकि वह जले नहीं और उसकी मिठास और सुगंध बनी रहे। धीरे-धीरे रस गाढ़ा होने लगता है और उसका रंग पहले हल्का सुनहरा, फिर गहरा भूरा रूप ले लेता है। जैसे-जैसे उबाल बढ़ता है, कड़ाही के आसपास गुड़ की मीठी खुशबू फैल जाती है। यह खुशबू पूरे गांव में सर्द हवाओं के साथ घुल-मिल जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि गुड़ बनाने का यह मौसम गांवों को उत्सव जैसा माहौल देता है। जब रस पूरी तरह गाढ़ा होकर गुड़ का रूप ले लेता है, तब उसे लकड़ी की बनी सांचों में या सीधे प्लेट में जमने के लिए डाल दिया जाता है। कुछ लोग ठोस गुड़ बनाते हैं, जबकि कुछ परिवार ‘पातालुवा’ यानी तरल गुड़ भी तैयार करते हैं, जिसका इस्तेमाल स्थानीय मिठाइयों और पकवानों में खासतौर पर होता है। बाजार में बढ़ी मांग, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलती है ताकत दलमा तराई में बनने वाला खजूरी गुड़ अपनी गुणवत्ता और प्राकृतिक मिठास के कारण आसपास के शहरों—जमशेदपुर, मानगो, चाकुलिया, घाटशिला—में काफी लोकप्रिय है। यह गुड़ बाजार में आसानी से बिक जाता है क्योंकि इसमें किसी तरह का मिलावट या केमिकल नहीं होता। इसे पूरी तरह पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है, जो इसकी खास पहचान है। ग्रामीण परिवार हर दिन 5 से 20 किलो तक गुड़ तैयार कर लेते हैं। गुड़ की कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 120 से 200 रुपये प्रति किलो तक रहती है। यह आय कई परिवारों के लिए सर्दियों के महीनों में महत्वपूर्ण सहारा बनती है। कुछ परिवार तो इस काम से इतना लाभ कमाने लगे हैं कि उन्होंने अधिक खजूर के पेड़ों की देखभाल शुरू कर दी है। कई गांवों में छोटे स्तर पर गुड़ खरीदने वाले व्यापारी भी पहुंचने लगे हैं, जिससे ग्रामीणों को गांव से बाहर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। स्थानीय स्वयं सहायता समूह (SHG) और युवा संगठन भी अब इस पारंपरिक उत्पाद को पैकिंग कर शहरों के मेलों और बाजारों में बेचने लगे हैं, जिससे इसकी मूल्यवृद्धि हो रही है। ऐसे प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ इस पुरानी परंपरा को भी मजबूत कर रहे हैं। मौसम बदलने की चुनौतियां, लेकिन परंपरा को बचाए रखने का संकल्प खजूर का रस पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। तापमान जितना कम होता है, रस उतना मीठा और अधिक मात्रा में मिलता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव का असर गांवों में भी महसूस किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले दिसंबर-जनवरी में तापमान काफी कम रहता था, जिससे रस अधिक निकलता था। लेकिन अब कई दिनों तक तापमान उतना नहीं गिरता, जिससे रस की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ रहा है। कभी-कभी पेड़ों में रोग लग जाने से भी रस की गुणवत्ता घट जाती है। फिर भी गांवों के लोग इस परंपरा को छोड़ने के मूड में नहीं हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान है। कई परिवार अपने बच्चों को भी रस निकालने और गुड़ बनाने की प्रक्रिया सिखा रहे हैं। कुछ युवा इस परंपरा को आधुनिक बाज़ार से जोड़ने का भी प्रयास कर रहे हैं-जैसे गुड़ को ब्रांडिंग करके ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचने की योजना, ताकि गांवों की यह मीठी परंपरा न सिर्फ बचे, बल्कि आगे बढ़े।

Khoboriya दिसम्बर 14, 2025 0
पटमदा क्षेत्र का हाथी खेदा मंदिर: आस्था, प्रकृति व परंपरा का संगम

HATHI KHEDA TEMPLE:जमशेदपुर शहर से लगभग 50–60 किलोमीटर की दूरी पर पटमदा प्रखंड स्थित है, जो अपनी हरियाली, पहाड़ियों और जंगलों के लिए जाना जाता है। इसी क्षेत्र में स्थित हाथी खेदा मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का नाम “हाथी खेदा” पड़ने के पीछे एक रोचक लोककथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि पुराने समय में इस क्षेत्र में जंगली हाथियों का झुंड अक्सर आया करता था और जिस स्थान पर वे ठहरते थे, वही स्थान आगे चलकर “हाथी खेदा” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। धीरे-धीरे इस स्थान पर एक छोटा सा पूजा स्थल बना, जिसने समय के साथ मंदिर का रूप ले लिया। स्थानीय जनमान्यता के अनुसार यह मंदिर कई दशकों पुराना है और ग्रामीण समाज की आस्था की जड़ें इससे गहराई से जुड़ी हुई हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल धार्मिक कारणों से आते हैं, बल्कि क्षेत्र की प्राकृतिक शांति और आध्यात्मिक वातावरण का भी अनुभव करते हैं।    पूजा-पद्धति, धार्मिक मान्यताएँ और पर्व-त्योहार   हाथी खेदा मंदिर में मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा होती है, हालाँकि यहाँ देवी-देवताओं की अन्य प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। सावन का महीना इस मंदिर के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ जलाभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहाँ मन्नत मांगते हैं, उनकी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। हर वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष आयोजन होता है। ग्रामीण महिलाएँ और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में भजन-कीर्तन और जागरण में भाग लेते हैं। इसके अलावा नागपंचमी, श्रावणी मेला और सावन के सोमवार को यहाँ भारी संख्या में भक्तों का जमावड़ा देखने को मिलता है। मंदिर की एक खास बात यह है कि यहाँ पूजा बहुत ही सरल और प्राकृतिक तरीके से होती है। बिना किसी आडंबर के, बेलपत्र, जल, दूध और फूल अर्पित कर भक्त अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। यही सादगी इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।   क्षेत्रीय जनजीवन और सांस्कृतिक महत्व   हाथी खेदा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि पटमदा क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। आसपास बसे गांवों के लोग किसी भी शुभ कार्य से पहले यहाँ दर्शन करने अवश्य आते हैं। विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश जैसे संस्कारों से पहले मंदिर में पूजा-अर्चना करना यहाँ की परंपरा का हिस्सा है। यह मंदिर आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति का सुंदर उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। पर्व-त्योहारों के दौरान पारंपरिक मांदर, ढोल और नगाड़ों की गूंज से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है। झारखंड की लोकनृत्य और लोकगीत परंपरा का अद्भुत दृश्य इन आयोजनों में देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में अक्सर सामुदायिक बैठकें, सामाजिक निर्णय और गांवों की समस्याओं पर चर्चा भी होती है। इस तरह यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का प्रतीक भी बन चुका है।   पर्यटन की संभावनाएँ और भविष्य की दिशा   हाथी खेदा मंदिर भविष्य में पटमदा क्षेत्र का एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल बन सकता है। मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण, घने जंगल और पहाड़ी दृश्य इस स्थान को और भी आकर्षक बनाते हैं। यदि यहाँ सड़क, पेयजल और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं का और विकास किया जाए, तो अधिक संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहाँ आ सकते हैं। स्थानीय प्रशासन और ग्रामवासियों के सहयोग से यहाँ छोटे स्तर पर धार्मिक मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जो क्षेत्र के विकास में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इससे न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे। आज हाथी खेदा मंदिर पटमदा क्षेत्र के लोगों के लिए केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और परंपरा का संगम बन चुका है। आने वाले समय में यह स्थान और अधिक प्रसिद्धि प्राप्त करेगा, ऐसी उम्मीद स्थानीय लोगों को है।

Khoboriya दिसम्बर 11, 2025 0
जादूगोड़ा स्थित रंकिनी मंदिर: पौराणिक आस्था और वर्तमान सामाजिक यथार्थ

JADUGORA : के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादूगोड़ा क्षेत्र में स्थित रंकिनी मंदिर जनजातीय आस्था और पौराणिक परंपराओं का एक अद्भुत संगम है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार रंकिनी देवी को ग्राम-रक्षक और क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। जनश्रुति है कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में असुर और दुष्ट आत्माओं का भय व्याप्त था। तब ग्रामवासियों ने एक शक्तिशाली देवी की आराधना की, जिससे “रंकिनी” का अवतरण हुआ। देवी ने क्षेत्र को भयमुक्त किया और ग्रामीणों को सुरक्षित जीवन का वरदान दिया। कुछ लोक परंपराओं में रंकिनी देवी को काली और दुर्गा का ही एक उग्र स्वरूप माना जाता है। कहा जाता है कि देवी को लाल रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पहले समय में उन्हें लाल वस्त्र और सिंदूर अर्पित करने की परंपरा रही है। पुराने समय में विशेष बलि-प्रथा भी प्रचलित थी, जो अब सामाजिक जागरूकता के कारण प्रतीकात्मक रूप में बदल गई है। रंकिनी देवी की पूजा मूलतः प्रकृति आधारित है, जिसमें जंगल, पहाड़ और जलस्रोतों को पवित्र माना जाता है।  मंदिर की स्थापना और जनजातीय आस्था रंकिनी मंदिर की स्थापना को लेकर कोई लिखित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं, लेकिन लोक कथाओं के अनुसार कई शताब्दियों से यहाँ देवी की पूजा होती आ रही है। प्रारंभ में यह स्थान केवल एक प्राकृतिक चट्टान और साल वृक्ष के नीचे स्थापित प्रतीकात्मक स्थल था, जहाँ गांव के मांझी, पुजारी और पाहन द्वारा सामूहिक पूजा कराई जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के सहयोग से यहाँ एक स्थायी मंदिर का निर्माण हुआ। जनजातीय समुदाय- विशेषकर संथाल, हो और मुंडा समाज – इस मंदिर को अपनी सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र मानते हैं। उनके जीवन में रंकिनी देवी केवल धार्मिक शक्ति नहीं, बल्कि जंगल, जल और जमीन की रक्षक के रूप में भी पूजित हैं। खेतों की फसल अच्छी हो, गांव में बीमारी न फैले और वन्य जीवों से बचाव हो – इन सभी कामनाओं के लिए देवी से प्रार्थना की जाती है। यहाँ की पूजा-पद्धति वैदिक और जनजातीय परंपराओं का मिश्रण है। ढोल, मांदर, धुप, चढ़ावा और सामूहिक गीतों के साथ देवी की आराधना की जाती है। आज भी साल में एक बार विशेष जनजातीय अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जिनमें सैकड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं। आधुनिक काल में रंकिनी मंदिर की वर्तमान स्थिति वर्तमान समय में जादूगोड़ा का रंकिनी मंदिर न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि यह क्षेत्र की सामाजिक और पर्यावरणीय चर्चा का भी केंद्र बन चुका है। जादूगोड़ा क्षेत्र यूरेनियम खनन के लिए प्रसिद्ध रहा है, जिसका असर आसपास के गांवों और लोगों के जीवन पर पड़ा है। ऐसे में रंकिनी मंदिर स्थानीय लोगों के लिए एक आस्था का सहारा बन गया है, जहाँ वे मानसिक शांति और सुरक्षा की भावना प्राप्त करते हैं। आज मंदिर तक पक्की सड़क की सुविधा उपलब्ध है और आसपास छोटे-बड़े बाजार तथा चाय-पान की दुकानें भी खुल गई हैं। सावन, नवरात्र और विशेष पूजा के समय यहाँ काफी भीड़ उमड़ती है। प्रशासन की ओर से भी त्योहारों के समय सुरक्षा और स्वच्छता पर ध्यान दिया जाता है। पहले की तुलना में अब यहाँ बलि प्रथा बहुत हद तक कम हो चुकी है और उसकी जगह नारियल, लाल चुनरी और प्रतीकात्मक भोग चढ़ाने की परंपरा बढ़ रही है। हालाँकि, मंदिर के आसपास के क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर स्थानीय लोगों में चिंता भी रहती है। इस कारण कई सामाजिक संगठन समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाते हैं। मंदिर इस पूरे क्षेत्र में सांत्वना और आशा का एक प्रतीक बना हुआ है। आस्था और यथार्थ के बीच रंकिनी मंदिर का महत्व आज के समय में रंकिनी मंदिर केवल एक पौराणिक स्थल नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ परंपरा और आधुनिक चुनौतियाँ आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। एक ओर यह मंदिर सदियों पुरानी जनजातीय संस्कृति और प्रकृति-पूजा का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह क्षेत्र औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों से जूझ रहा है। फिर भी, स्थानीय लोगों की आस्था आज भी उतनी ही प्रबल है। विवाह से पहले, नई फसल के समय, या किसी बड़ी समस्या के समय गांव के लोग पहले देवी के चरणों में शीश नवाते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यह विश्वास चला आ रहा है कि रंकिनी देवी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। रंकिनी मंदिर आज भी जादूगोड़ा की पहचान बना हुआ है – एक ऐसा स्थल जो आदिवासी जीवन-दर्शन, प्रकृति-प्रेम और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। भविष्य में यदि इस स्थान का संतुलित विकास किया जाए, तो यह झारखंड के प्रमुख सांस्कृतिक-धार्मिक स्थलों में और भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है।

Khoboriya दिसम्बर 11, 2025 0
फूलों की खेती : ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुंदरता और समृद्धि का संगम

Flower: फूलों की खेती आज के दौर में न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला प्रमुख व्यवसाय भी बन गया है। भारत में विभिन्न प्रकार के फूलों की खेती तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा मिल रहा है और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है। फूलों की मांग शादी, त्योहार, पूजा-पाठ समेत सजावट के कई अवसरों पर उच्च होती है, अतः इसका व्यवसाय बहुत लाभदायक साबित हो रहा है।   भारत में अलग-अलग जलवायु और मिट्टी के अनुसार मुर्गी, गुलाब, गेंदे, कमल, चमेली, गेंदा, सूरजमुखी, बाल, लिली, नर्गिस, यास्मीन जैसे अनेक प्रकार के फूलों की खेती होती है। हर फूल की खेती की अपनी तकनीक, पानी की आवश्यकता और देखभाल के तरीके होते हैं। उदाहरण के लिए गुलाब की खेती ठंडे क्षेत्र में अधिक होती है, जबकि गेंदे और सूरजमुखी गर्म इलाकों में अच्छे से उगते हैं।     तकनीकी सहायता और सरकारी प्रोत्साहन फूलों की खेती के लिए तकनीकी सहायता और सरकारी योजनाएं किसानों के लिए कारगर साबित हो रही हैं। कृषि विभाग द्वारा किसानों को नई किस्मों की जानकारी, बेहतर बीज, उन्नत सिंचाई तकनीक और कीट नियंत्रण के उपाय उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। साथ ही, मंडियों में मुकाबलागत कीमत पर फूलों की बिक्री के लिए सपोर्ट सिस्टम भी विकसित किया गया है, जिससे किसानों के उत्पाद सीधे बाजार तक पहुंचते हैं और बिचौलियों की भूमिका कम होती है।     आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभ फूलों की खेती से किसानों को आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। फूल पौधे हवा को शुद्ध करते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में सहायता देते हैं। इसके अलावा, फूलों की खेती से किसानों को रोजगार के नये अवसर भी मिलते हैं, विशेषकर महिलाएं इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्र में फूलों की पैदावार से महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है, जो सामाजिक विकास का सूचक है।     बाजार की मांग और निर्यात देश में त्योहारों, विवाहों, और अध्यात्मिक आयोजनों में फूलों की मांग चरम पर होती है। इसके अलावा, फूलों का निर्यात भी बढ़ रहा है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय फूलों की प्रतिष्ठा बढ़ रही है। ताजी कटी हुई फूलों के साथ-साथ डried flowers, फ्लोरल आर्टिफैक्ट्स और खुशबूदार तेलों का भी निर्यात बढ़ा है। यह व्यवसाय ग्रामीण युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ जोड़ रहा है और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित कर रहा है।     चुनौतियां और समाधान फूलों की खेती के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी हैं जैसे मौसम की अनिश्चितता, कीट और रोगों का प्रकोप, और उचित बाजार मूल्य का न मिलना। इन समस्याओं को हल करने के लिए किसानों को संवेदनशील कृषि तकनीक अपनानी होंगी। स्मार्ट खेती, जल संरक्षण के उपाय, और बेहतर बाजार व्यवस्था के माध्यम से इन कठिनाइयों को कम किया जा सकता है। सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएं मिलकर प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान कर रही हैं, जिससे किसानों का भरोसा बढ़ा है।

Khoboriya दिसम्बर 8, 2025 0
तुरामडीह में त्रिपक्षीय वार्ता के बाद तालसा टेलिंग पॉड में पुन: काम शुरू

तुरामडीह माइंस कक्ष में शनिवार को केरूआडुंगरी के मुखिया कान्हू मुर्मू की देखरेख में तालसा ग्रामसभा, तुरामडीह विस्थापित समिति व यूसिल प्रबंधन की त्रिपक्षीय वार्ता हुई. त्रिपक्षीय वार्ता में ग्रामीणों की मांग, ठेका कार्यों में नियोजन एवं विस्थापित-प्रभावित परिवारों के विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गयी. वार्ता के बाद कई बिंदुओं पर यूसिल प्रबंधन, तालसा ग्रामसभा व विस्थापित-प्रभावित परिवार ने अपनी सहमति प्रदान की. जिसके बाद तालसा टेलिंग पॉड में पुन: काम को शुरू कर दिया गया.   त्रिपक्षीय वार्ता में यूसिल प्रबंधन की ओर से माइंस मैनेजर एमके मिश्रा, मिल अधिकारी-सुरेश कुमार टोपनो, पर्सनल जादूगोड़ा-जीके गुप्ता, पर्सनल मैनेजर-संजीव रंजन, पर्सनल मैनेजर सीएसआर-स्टेलिन हेंब्रम, विस्थापित समिति और ग्रामसभा की ओर से तुरामडीह विस्थापित समिति के अध्यक्ष-मोगदो दिग्गी, ग्रामप्रधान-एमपी दिग्गी, घसिया होनहागा, केरूआडुंगरी पंचायत के मुखिया-कान्हू मुर्मू, तालसा गांव के माझी बाबा-दुर्गाचरण मुर्मू, माझी बाबा उपेंद्र मुर्मू, भागमत मार्डी, जितेन हेंब्रम, वकील हेंब्रम, देबई दिग्गी, जॉन गुड़िया, मुकेश दिग्गी, मोटाई दिग्गी,   इन बिंदुओं पर बनी सहमति तुरामडीह विस्थापित समिति, नांदूप ग्रामसभा एवं तालसा ग्रामसभा द्वारा उपलब्ध करायी गयी श्रमिकों की सूची की जांच कर अनुशंसा के आधार पर स्थानीय श्रमिकों को प्राथमिकता दी जायेगी. अर्ध-कुशल/कुशल श्रमिक स्थानीय स्तर पर नहीं मिलते हैं तो कॉन्ट्रैक्टर अपने स्तर से श्रमिक उपलब्ध करायेगा तालसा ग्रामसभा द्वारा भेजे गये 14 लोगों की सूची को सिविल मेंटेनेंस कार्य में नियुक्त किया जायेगा- यूसिल प्रबंधन द्वारा विस्थापित समिति एवं ग्रामसभाओं के साथ हर महीने नियमित बैठक की जायेगी

Khoboriya दिसम्बर 8, 2025 0
बुनियादी संरचना को दुरुस्त करने से ही मिलेगी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

MUSABANI : मुसाबनी प्रखंड मुख्यालय स्थित ब्लॉक रिसोर्स सेंटर (BRC) में चल रहे शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम को उपायुक्त कर्ण, सत्यार्थी ने संबोधित किया। क्षेत्र निरीक्षण के क्रम में उपायुक्त मुसाबनी प्रखंड में थे। उन्होने बीआरसी को शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी संरचना का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की शुरुआत प्रशिक्षित, सजग और नवाचार और तकनीकपूर्ण शिक्षकों से होती है। प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपायुक्त ने कहा कि बीआरसी न केवल प्रशासनिक इकाई है, बल्कि यह विद्यालयों की शैक्षणिक प्रगति, शिक्षक क्षमता-विकास और सतत् मॉनिटरिंग का केंद्र है। उपायुक्त ने स्पष्ट किया कि हर शिक्षक में अद्यतन विषय-ज्ञान, नवाचार-आधारित शिक्षण और सतत् सुधार की प्रवृत्ति विकसित करना आवश्यक है। कक्षा-कक्ष शिक्षण में नवीन पद्धतियों का समावेशन, विशेषकर फाउंडेशनल लर्निंग, न्यूमेरसी, लर्निंग आउटकम-आधारित शिक्षण और गतिविधि-आधारित शिक्षा को स्कूलों में प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए। स्कूलों की शैक्षणिक प्रगति का नियमित मूल्यांकन, उपस्थिति, सीखने के स्तर और मासिक समीक्षा अनिवार्य रूप से की जाए। उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने बीआरसी टीम और प्रशिक्षण दे रहे मास्टर ट्रेनर्स को निर्देश दिया कि प्रशिक्षण को परिणाम-आधारित बनाया जाए । केवल सत्र आयोजित करना पर्याप्त नहीं है, प्रशिक्षण का असर कक्षा-कक्ष में व्यवहार और सीखने के स्तर पर दिखना चाहिए। शिक्षकों को प्रशिक्षण के बाद निरंतर मार्गदर्शन एवं सहायता सुनिश्चित की जाए ताकि वे वास्तविक परिस्थितियों में नई विधियों को अपनाने में सहज हो सकें। कमजोर प्रदर्शन करने वाले विद्यालयों पर विशेष ध्यान दें। बीआरसी द्वारा ऐसे विद्यालयों की पहचान कर त्वरित सुधार योजना तैयार करने को कहा गया।  उपायुक्त ने उपस्थित शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों के पहले प्रेरक, पहले मार्गदर्शक और भविष्य निर्माण के मूल कड़ी शिक्षक हैं। जिले में शिक्षा गुणवत्ता सुधार तभी संभव है जब शिक्षक स्वयं को निरंतर अद्यतन करें और हर बच्चे तक सीखने के अवसर समान रूप से पहुंचाएं। विद्यालयों में सीखने का वातावरण बेहतर हो । प्रत्येक बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचे ।  

Khoboriya दिसम्बर 5, 2025 0
ग्राम पंचायतों को वित्तीय सशक्तिकरण करने के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया

राज्य सरकार एवं पंचायती राज विभाग, झारखंड के निर्देशानुसार पंचायतों के वित्तीय सशक्तिकरण को बढ़ावा देने हेतु दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन 28 एवं 29 नवम्बर 2025 को जिला पंचायत संसाधन केंद्र (DPRC) जमशेदपुर में किया गया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य ग्राम पंचायतों को स्वयं के राजस्व स्रोत (Own Source Revenue - OSR) की जानकारी प्रदान करना तथा ग्राम स्तर पर राजस्व सृजन के माध्यम से वित्तीय आत्मनिर्भरता विकसित करना रहा । सभी 11 प्रखंडों के पंचायती राज से संबंधित अधिकारी एवं कर्मियों ने भाग लिया।   प्रशिक्षण के दौरान राज्य स्तरीय प्रशिक्षक अजय कुमार मिश्र एवं सुशांत कुमार ढोके ने प्रतिभागियों को विभिन्न तकनीकी, व्यवहारिक एवं प्रबंधन संबंधी विषयों पर विस्तार से प्रशिक्षण दिया जिनमें ग्राम पंचायतों के स्वयं के राजस्व स्रोतों (OSR) की पहचान, वर्गीकरण एवं उनकी महत्ता। OSR संवर्धन हेतु रणनीतियां एवं पंचायत स्तर पर व्यवहार्य कार्ययोजना निर्माण की प्रक्रिया। कर भुगतान के प्रति ग्रामीणों में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने, ग्राम विकास योजनाओं में OSR के प्रभावी उपयोग एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उपाय। नवीन वित्तीय विकल्प जैसे PPP मॉडल, CSR फंड एवं स्थानीय निवेश के अवसर। सतत संसाधन सृजन हेतु राजस्व पूर्वानुमान, योजना निर्माण एवं कार्यान्वयन प्रक्रिया। SWOT विश्लेषण के माध्यम से पंचायतों की वित्तीय स्थिति का यथार्थ मूल्यांकन। ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में परियोजना प्रबंधन कौशल का व्यावहारिक उपयोग।   प्रशिक्षण सत्रों में समूह कार्य, चर्चा सत्र एवं केस स्टडी के माध्यम से प्रतिभागियों को व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया गया। प्रशिक्षकों ने पंचायतों की स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित उदाहरणों के माध्यम से यह बताया कि किस प्रकार संपत्ति कर, बाजार शुल्क, जल उपयोग शुल्क, संपत्ति उपयोग शुल्क जैसे स्रोतों से स्थायी एवं पारदर्शी राजस्व सृजन किया जा सकता है। प्रतिभागियों को विभागीय नीतियों, ऑनलाइन उपकरणों एवं डेटा-आधारित योजना निर्माण के व्यावहारिक उपयोग से भी अवगत कराया गया।   समापन सत्र में प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल संचालन जिला पंचायत राज पदाधिकारी रिंकू कुमारी एवं डीपीएम राजू झा ने किया । उन्होंने सभी मुखिया एवं सचिवों से अपील की कि वे प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में लाकर अपने पंचायत क्षेत्र में राजस्व संग्रहण की एक पारदर्शी, उत्तरदायी एवं सतत प्रणाली विकसित करें।  

Khoboriya दिसम्बर 7, 2025 0
9, 10 व 11 जनवरी को गोपाल मैदान में साहित्य उत्सव का होगा आयोजन

जिला प्रशासन, पूर्वी सिंहभूम की ओर से जनवरी माह 2026 में प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव प्रस्तावित है। आगामी 09, 10 और 11 जनवरी 2026 को गोपाल मैदान, जमशेदपुर में तीन दिवसीय साहित्य उत्सव के आयोजन को लेकर उपायुक्त श्री कर्ण सत्यार्थी ने कार्यालय कक्ष में पदाधिकारियों के साथ बैठक कर आवश्यक दिशा - निर्देश दिए । उत्सव की व्यापक तैयारी को लेकर उपायुक्त ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर विस्तृत चर्चा की तथा कार्यक्रम के सफलतापूर्वक संचालन हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।   उपायुक्त ने कहा कि यह उत्सव जिले के सांस्कृतिक और बौद्धिक वातावरण को समृद्ध करेगा। उन्होंने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के अधिक से अधिक साहित्यप्रेमी नागरिकों की सहभागिता सुनिश्चित करने के निर्देश पदाधिकारियों को दिए, ताकि साहित्य उत्सव का लाभ सिर्फ शहर तक सीमित न रहकर पूरे जिले तक पहुँच सके।   बैठक में स्टॉल व्यवस्था, साहित्यकारों की भागीदारी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, पुस्तक प्रदर्शन, अतिथि समन्वय तथा अन्य व्यवस्थागत पहलुओं पर विस्तार से विमर्श किया गया। उपायुक्त ने सभी विभागों को निर्धारित समयसीमा में तैयारी पूर्ण करने तथा विभिन्न समितियों का गठन करते हुए सक्रिय रूप से समन्वय स्थापित कर कार्य करने का निर्देश दिया। उपायुक्त ने कहा कि साहित्य उत्सव न केवल साहित्यकारों और पाठकों के बीच एक संवाद मंच प्रदान करेगा, बल्कि युवाओं में साहित्यिक अभिरुचि विकसित करने का भी अवसर देगा।      

Khoboriya दिसम्बर 1, 2025 0
डीसी ने मुसाबनी के घीभांगा सबर टोला का किया दौरा

EAST SINGHBHUM: पूर्वी सिंहभूम जिले के उपायुक्त  कर्ण सत्यार्थी निरीक्षण के क्रम में मुसाबनी प्रखंड अंतर्गत घीभांगा सबर टोला पहुंचे । इस दौरान उन्होंने ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं और सरकारी योजनाओं की स्थिति का आकलन किया । ग्रामीणों ने उपायुक्त का ध्यान विशेष रूप से पेयजल समस्या, कमजोर मोबाइल नेटवर्क तथा बिजली व्यवस्था की ओर आकृष्ट कराया । ग्रामीणों ने जीविकोपार्जन से जुड़ी चुनौतियों को भी साझा किया । इस क्रम में उपायुक्त ने ग्रामीणों से यह भी जाना कि उन्हें सरकारी योजनाओं विशेषकर आजीविका मिशन, मनरेगा, राशन, पेंशन एवं आवास जैसी योजनाओं का लाभ नियमित रूप से मिल रहा है या नहीं। मौके पर उपायुक्त द्वारा पेयजल संकट को दूर करने के लिए त्वरित विकल्पों की पहचान किए जाने तथा खराब जलस्रोतों की मरम्मती, नेटवर्क समस्या को दूर करने के लिए दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के साथ समन्वय स्थापित कर आवश्यक कार्रवाई तथा बिजली आपूर्ति के लिए विभागीय पदाधिकारी को आवश्यक दिशा-निर्देश दिया गया । जीविकोपार्जन के स्थानीय विकल्पों पर ग्रामसभा एवं आजीविका समूहों के साथ मिलकर कार्ययोजना तैयार करने की भी बात कही गई ।   उपायुक्त ने ग्रामीणों से बातचीत के दौरान कहा कि सबर समुदाय जैसे संवेदनशील और वंचित वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ प्राथमिकता के आधार पर पहुंचना आवश्यक है। जिला प्रशासन का उद्देश्य है कि किसी भी परिवार को पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित न रहना पड़े। सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्रवाई करें तथा समस्याओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित करें। निरीक्षण के दौरान अंचल अधिकारी-सह प्रभारी बीडीओ श्री पवन कुमार तथा प्रखंड के अन्य पदाधिकारी और कर्मी उपस्थित थे।   

Khoboriya दिसम्बर 2, 2025 0
उपायुक्त ने जन शिकायतों को सुना व समाधान निकालने का आश्वासन दिया

JAMSHEDPUR:समाहरणालय स्थित कार्यालय कक्ष में आयोजित जन शिकायत निवारण दिवस के दौरान उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने विभिन्न प्रखंडों एवं शहरी क्षेत्रों से पहुँचे नागरिकों से मुलाकात की। इस क्रम में उन्होंने आम जनता द्वारा प्रस्तुत शिकायतों और सुझावों को विस्तार से सुना। जन सुनवाई के दौरान पेंशन, आर्थिक सहयोग, दुकान आवंटन, लंबित वेतन भुगतान, घरेलू विवाद, भूमि–विवाद, चिकित्सा सहायता, अवैध जमाबंदी रद्द करने, आधार सीडिंग, अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति, स्थानांतरण, नाली निर्माण, म्यूटेशन, ऋण माफी और सड़क निर्माण से जुड़ी कई समस्याएँ लोगों ने रखीं। उपायुक्त ने सभी मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभागीय पदाधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई हेतु निर्देशित किया।   समयबद्ध कार्रवाई को कहा अनिवार्य, विभागों को निर्देश उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि जन सुनवाई के दौरान प्राप्त सभी आवेदनों पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी मामले के समाधान में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए। जन शिकायत निवारण दिवस का उद्देश्य जनता की समस्याओं को सीधे सुनकर उनका त्वरित समाधान करना है। उपायुक्त ने विभागों को नियमित मॉनिटरिंग करने और लंबित मामलों की समीक्षा जारी रखने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि प्रशासन जनहित से जुड़े प्रत्येक मुद्दे को प्राथमिकता दे रहा है तथा जनता की समस्याओं के समाधान में पूरी गंभीरता से कार्य किया जाएगा।

Khoboriya नवम्बर 28, 2025 0
राजाबासा गांव में 6 परिवार को मिला मुख्यमंत्री उज्जवल झारखंड योजना का लाभ

घाटशिला प्रखंड अंतर्गत राजाबासा गांव के एक टोला में मुख्यमंत्री उज्जवल झारखंड योजना के तहत आज से विद्युत आपूर्ति शुरु हो गई है । बिजली सुविधा से वंचित 6 परिवारों को इस योजना के अंतर्गत कनेक्शन प्रदान किया गया जिसपर ग्रामीणों ने खुशी जाहिर की ।    इस अवसर पर उपायुक्त श्री कर्ण सत्यार्थी ने राजाबासा गांव पहुंचकर योजना के क्रियान्वयन की गुणवत्ता का स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि सभी 6 परिवारों को सुरक्षित और सुचारू ढंग से विद्युत सुविधा मिलती रहे, आगे किसी प्रकार की बाधा न आए। उपायुक्त ने ग्रामीणों से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी अन्य स्थानीय समस्याओं व आवश्यकताओं को भी सुना तथा मौके पर मौजूद घाटशिला बीडीओ को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उपायुक्त ने कहा कि मुख्यमंत्री उज्जवल झारखंड योजना के तहत छूटे हुए गांव-टोलों में विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास है । योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जा रहा है, राज्य सरकार के निर्देशानुसार जिला प्रशासन का प्रयास है कि कोई भी परिवार मूलभूत सुविधा से वंचित न रहे ।  

Khoboriya नवम्बर 27, 2025 0
चाकुलिया के सरडीहा में जंगली हाथी ने मचाया उत्पात

चाकुलिया प्रखंड की सरडीहा पंचायत के रूपुषकुंडी गांव में गुरुवार की सुबह एक जंगली हाथी ने हिंसक उत्पात मचाया। इस घटना में गांव के समीर कुमार दे नामक दुकानदार को भारी नुकसान हुआ है। करीब तीन बजे सुबह हाथी समीर कुमार की दुकान पर पहुंचा और उसने दुकान का शटर तोड़ दिया। फिर अंदर रखे सामान को बर्बाद कर दिया। दुकानदार ने बताया कि हाथी ने दुकान में रखी पांच बोरी मुड़ी और तीन बोरी आलू खा लिए और पैरों से रगड़कर पूरा माल जला दिया। इस घटना से उन्हें लगभग 50 हजार रुपए का नुकसान हुआ है। दुकान खोलने पहुंचे समीर कुमार को सुबह इस आपदाग्रस्त स्थिति का पता चला। वहीं, गांव के आसपास जंगल में हाथी के रहने से ग्रामीण डर के साये में जी रहे हैं।

Khoboriya नवम्बर 27, 2025 0
ठंड बढ़ने से झारखंड में मौसम हुआ सर्द

झारखंड के कई जिलों में पिछुआ हवाओं के कारण ठंड में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के अनुसार, पिछुआ हवाएं उत्तर से उत्तर-पश्चिम दिशा से चल रही हैं, जिनके कारण न्यूनतम तापमान में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आई है। राजधानी रांची सहित आसपास के क्षेत्रों में सुबह का तापमान करीब 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास है, जिससे सुबह के समय काफी ठंडक बढ़ गई है। इस वर्ष सर्दी ने अपनी दस्तक समय से पहले दे दी है, क्योंकि मौसम विभाग ने पहले ही नवंबर के अंत से ठंड बढ़ने की चेतावनी दी थी। रातों में तापमान करीब 9 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे पूरे क्षेत्र में ठंड का असर महसूस किया जा रहा है।   राज्य के अधिकांश जिलों में मंगलवार को मौसम साफ और शुष्क रहा और मध्यम तेजी से हवा चली, जिससे ठंडी हवा का अनुभव हुआ। पिछले 24 घंटों में गोड्डा जिले में अधिकतम तापमान 28.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि गुमला में न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ। रांची में अधिकतम तापमान 24.6 और न्यूनतम 11.1 डिग्री सेल्सियस रहा। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को सलाह दी है कि इस ठंड में फसलों की सुरक्षा के लिए सिंचाई का विशेष ख्याल रखा जाए ताकि वे प्रभावित न हों।   मौसम विभाग ने सूचना दी है कि बंगाल की खाड़ी में दबाव का क्षेत्र बन रहा है, जिससे चक्रवात बनने की संभावना है। यह चक्रवात झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों के मौसम पर असर डाल सकता है। इस कारण अगले दो दिनों में तापमान में और गिरावट आने की संभावना है और बारिश या तेज हवाओं के चलते खेल आयोजन प्रभावित हो सकता है।राजधानी रांची सहित अन्य जिलों में पछुआ हवाओं के कारण कनकनी बढ़ गई है, जिससे सुबह और शाम की ठंड अधिक महसूस होती है।

Suraj नवम्बर 27, 2025 0
आदिवासी-मूलवासी को अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए एकजुट होने की है जरूरत: दिनकर

जमशेदपुर: बारीडीह चौक में बिरसा सेना के केंद्रीय अध्यक्ष दिनकर कच्छप की अगुवाई में वीर शहीद कोंका करमाली को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी गयी है. संगठन के सदस्यों व स्थानीय युवाओं ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया. श्री कच्छप ने कहा कि आदिवासी-मूलवासी समाज के लोगों को अपने महापुरूषों के इतिहास को जानने व समझने का प्रयास करना चाहिए. उन्होंने जल, जंगल व जमीन की बचाये रखने के लिए आंदोलन कर अपने प्राणों की आहुति दी. लेकिन वर्तमान समय में आदिवासी-मूलवासियों का जमीन सुरक्षित नहीं है. उन्हें उनके जमीन से बेदखल किया जा रहा है. इसलिए अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए तमाम आदिवासी व मूलवासी को एकजुट होने की जरूरत है. इस अवसर पर गोपाल लोहार, अनमोल पात्रो, अंकित कुमार, अंता टुडू, समीर पाड़ेया, अखिल कच्छप, भीम राज कच्छप, ऋतिक बोयपाई, पृथ्वी सामद, राजा पूर्ति, अजय लोहार, राजू कर्मकार, महावीर लोहार, अरविंद मुखी समेत अन्य मौजूद थे.

Khoboriya नवम्बर 21, 2025 0
रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का हुआ समापन

जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में बुधवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का समापन हुआ. इस पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन शाम को नागपुरी, संताली और जनजातीय लोकगीतों की गूंज के साथ पूरा मैदान झूम उठा. देश के विभिन्न राज्यों से आये कलाकारों ने अपने लोक संगीत और नृत्य से जनजातीय संस्कृति की विविधता का परिचय कराया. नागपुरी गायक अर्जुन लकड़ा और गायिका गरिमा एक्का ने संवाद अखड़ा मंच को संभाला. जैसे ही अर्जुन लकड़ा संवाद अखड़ा मंच पर पहुंचे, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. दर्शकों ने उनकी पसंदीदा गीतों की फरमाइश शुरू कर दी. लकड़ा ने अपने ट्रेडिंग गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को जोश से भर दिया. उनका गायकी का अंदाज और स्टेज कवरिंग शैली दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर रही थी. इसके बाद संताली गायिका कल्पना हांसदा ने अपनी मधुर आवाज में पारंपरिक व मॉडर्न गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लिया. उनके गीतों की धुन पर युवाओं ने मैदान में समूह बनाकर नृत्य किया. रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने एक-दूसरे का हाथ थाम लोकनृत्य की लय पर झूमकर ट्राइबल संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी. जनजातीय संगीत पर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग और युवा उपस्थित थे. हर गीत, हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही. युवाओं ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर इस सांस्कृतिक माहौल को कैद किया. सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आये कलाकारों ने भी अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी. संवाद अखड़ा के मंच पर इन कलाकारों ने लोकनृत्य, पुनर्जीवित रिवाजों और जनजातीय संगीत के सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम समापन की यह शाम सांस्कृतिक विविधता का उत्सव बना. लौहनगरी जमशेदपुर की धरती पर कलाकारों ने एकता और कला के नये रंग भी बिखेरा. स्टॉलों से एक करोड़ से अधिकार का हुआ कारोबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में जनजातीय व्यंजनों के स्टॉल समेत कला और हस्तशिल्प व पारंपरिक उपचार के स्टॉल्स के कई स्टॉल भी लगाये थे. जहां शहर समेत कोल्हान के विभिन्न जगहों से आये लोगों ने जमकर खरीदारी भी की. टीएसएफ के रिपोर्ट के मुताबिक इसबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में एक करोड़ से अधिक का कारोबार हुआ है. इससे यह बात साबित होती है कि जनजातीय समाज की वस्तुएं अब ब्रांड बन चुकी हैं. जिसे आदिवासी ही नहीं अन्य समाज व समुदाय के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं. संवाद फेलोशिप के लिए नौ फेलो का किया चयन टाटा स्टील फाउंडेशन ने संवाद फेलोशिप 2025 के लिए 9 फेलो के चयन की भी घोषणा की. इनका चयन 572 आवेदनों में से किया गया, जो 25 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 122 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जिनमें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों से 10 आवेदक शामिल थे. फाउंडेशन ने पिछली कई फेलोशिप परियोजनाओं के पूरा होने का भी जश्न मनाया.

Khoboriya नवम्बर 21, 2025 0
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ठंड बढ़ने से झारखंड में मौसम हुआ सर्द

झारखंड के कई जिलों में पिछुआ हवाओं के कारण ठंड में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के अनुसार, पिछुआ हवाएं उत्तर से उत्तर-पश्चिम दिशा से चल रही हैं, जिनके कारण न्यूनतम तापमान में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आई है। राजधानी रांची सहित आसपास के क्षेत्रों में सुबह का तापमान करीब 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास है, जिससे सुबह के समय काफी ठंडक बढ़ गई है। इस वर्ष सर्दी ने अपनी दस्तक समय से पहले दे दी है, क्योंकि मौसम विभाग ने पहले ही नवंबर के अंत से ठंड बढ़ने की चेतावनी दी थी। रातों में तापमान करीब 9 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे पूरे क्षेत्र में ठंड का असर महसूस किया जा रहा है।   राज्य के अधिकांश जिलों में मंगलवार को मौसम साफ और शुष्क रहा और मध्यम तेजी से हवा चली, जिससे ठंडी हवा का अनुभव हुआ। पिछले 24 घंटों में गोड्डा जिले में अधिकतम तापमान 28.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि गुमला में न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ। रांची में अधिकतम तापमान 24.6 और न्यूनतम 11.1 डिग्री सेल्सियस रहा। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को सलाह दी है कि इस ठंड में फसलों की सुरक्षा के लिए सिंचाई का विशेष ख्याल रखा जाए ताकि वे प्रभावित न हों।   मौसम विभाग ने सूचना दी है कि बंगाल की खाड़ी में दबाव का क्षेत्र बन रहा है, जिससे चक्रवात बनने की संभावना है। यह चक्रवात झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों के मौसम पर असर डाल सकता है। इस कारण अगले दो दिनों में तापमान में और गिरावट आने की संभावना है और बारिश या तेज हवाओं के चलते खेल आयोजन प्रभावित हो सकता है।राजधानी रांची सहित अन्य जिलों में पछुआ हवाओं के कारण कनकनी बढ़ गई है, जिससे सुबह और शाम की ठंड अधिक महसूस होती है।

“जंगल का तोहफा”: झारखंड की पारंपरिक औषधीय धरोहर

Adivasi food: झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में पाई जाने वाली यह परंपरा संथाल, हो, ओरांव और मुंडा जैसे आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। जंगलों से गहरा रिश्ता रखने वाले ये समुदाय प्राकृतिक संसाधनों को भोजन और औषधि के रूप में उपयोग करते आए हैं। सर्दियों के मौसम में यह पारंपरिक खाद्य पदार्थ पारिवारिक भोज का विशेष हिस्सा बन जाता है और इसे प्यार से “जंगल का तोहफा” कहा जाता है। यह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलित जीवनशैली का प्रतीक भी है। ओडिशा में इसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिल चुका है, जिससे इसकी विशिष्टता और पारंपरिक महत्व को आधिकारिक मान्यता मिलती है। सेहत का प्राकृतिक कवच: ठंड से लेकर इम्युनिटी तक सर्दियों में इसका सेवन शरीर को अंदर से गर्म रखता है और ठंड व सर्दी-जुकाम से बचाव में सहायक माना जाता है। यह भूख बढ़ाने में भी मदद करती है, जिससे शरीर को भरपूर पोषण मिलता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है। इसके नियमित सेवन से हड्डियाँ और मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, जिससे शारीरिक कमजोरी दूर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पारंपरिक घरेलू औषधि के रूप में भी अपनाया जाता है, खासकर बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए। रोगों से लड़ने में सहायक और बढ़ती लोकप्रियता आदिवासी समाज में यह धारणा प्रचलित है कि यह प्राकृतिक खाद्य पदार्थ कई तरह की बीमारियों में राहत पहुँचा सकता है। कोरोना, मलेरिया, पीलिया, बुखार, एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में इसे सहायक माना जाता है। परंपरागत विश्वासों के अनुसार, चींटियों के काटने से होने वाले बुखार में भी यह लाभकारी हो सकता है। इसके अलावा, वजन बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत करने और शरीर को डिटॉक्स करने में इसकी भूमिका बताई जाती है। आजकल शहरी क्षेत्रों में भी लोग इसे स्वास्थ्यवर्धक सुपरफूड के रूप में अपनाने लगे हैं, जिससे यह ग्रामीण और आदिवासी सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक पहचान बना रहा है।

झारखंड राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2025 का भव्य आगाज, सांस्कृतिक रंगों संग सिनेमा का जश्न शुरू

FILM FESTIVAL: श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के प्रेक्षागृह में सोमवार को झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव – 2025 (छठा संस्करण) का शुभारंभ बेहद गरिमामय और उत्साहपूर्ण वातावरण में हुआ। फ़िल्म और कला जगत से जुड़े अनेक गणमान्यों की उपस्थिति ने उद्घाटन समारोह को खास बना दिया। मुख्य अतिथि के रूप में आदित्यपुर नगर निगम की उपनगर आयुक्त परुल सिंह तथा सह मुख्य अतिथि के रूप में श्रीनाथ यूनिवर्सिटी के कुलपति सुखदेव महतो ने समारोह की शोभा बढ़ाई। विशिष्ट सम्मानित अतिथियों में डॉ. जे.एन. दास,डॉ ज्योति सिंह, पूरबी घोष, पवन कुमार साव, चंचल भाटिया, नेहा तिवार, ज्योति सेनापति, पूर्व वार्ड पार्षद नीतू शर्मा शामिल रहे।   समारोह की शुरुआत परिचय और स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। इसके बाद सांस्कृतिक टीम द्वारा प्रस्तुत आकर्षक स्वागत नृत्य ने मंच का माहौल जीवंत कर दिया। JNFF के संस्थापक संजय सतपथी और राजू मित्रा ने स्वागत भाषण में महोत्सव की यात्रा, उद्देश्य और झारखंड में फ़िल्म संस्कृति के विस्तार पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथियों एवं विशिष्ट अतिथियों को पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया। सभी मान्यवरों ने अपने प्रेरक संबोधन से कार्यक्रम की गरिमा को नई ऊँचाई दी।   मंचीय कार्यक्रम के दौरान लोकप्रिय शॉर्ट फ़िल्म “Silk Coffin” की विशेष स्क्रीनिंग की गई, जिसे दर्शकों ने विशेष प्रशंसा दी। महोत्सव को सफल बनाने में संस्थापकों के साथ-साथ क्रिएटिव डायरेक्टर शिवांगी सिंह,डॉ. शालिनी प्रसाद का रचनात्मक नेतृत्व अत्यंत प्रभावी रहा। झारखंड राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 08 से 13 दिसंबर तक आयोजित होगा। 09 से 12 दिसंबर तक विभिन्न श्रेणियों की फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, जबकि 13 दिसंबर को समापन एवं पुरस्कार समारोह (Award Night) XLRI, जमशेदपुर में होगा।

झारखंड आंदोलनकारी सामाजिक सुरक्षा, सम्मान व अधिकारों के मुद्दें को लेकर घाटशिला में जुटेंगे

जमशेदपुर: राज्यभर के झारखंड आंदोलनकारी सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं. इसी मुद्दे को लेकर ‘झारखंड आंदोलनकारी सेनानी समन्वय आह्वान’ ने 22 नवंबर को बाबा तिलका माझी क्लब, फुलडुंगरी, घाटशिला में एक बैठक बुलाया गया है. आयोजन समिति के प्रो. श्याम मुर्मू, संतोष सोरेन, आदित्य प्रधान, सुराई बास्के व अजीत तिर्की ने संयुक्त रूप से बताया कि वर्तमान सामाजिक सुरक्षा नीति सीमित होने के कारण हजारों आंदोलनकारी विशेषकर वे जो जेल नहीं गये थे, पर आंदोलन में उनका सक्रिय भूमिका रहा है. लेकिन वे आज भी पेंशन, स्वास्थ्य सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित है. इस स्थिति में अब एक मजबूत संयुक्त मंच की आवश्यकता महसूस की जा रही है. ताकि आंदोलन मजबूती के साथ अपनी मांगों को सरकार के सामने रख सके. उन्होंने सभी आंदोलनकारियों से अपील किया है कि वे उक्त बैठक में आवश्यक रूप से भाग ले.   ये हैं प्रमुख मांगें -सभी आंदोलनकारियों को समान सामाजिक सुरक्षा एवं प्रशस्ति पत्र दिया जाये -पेंशन में उचित वृद्धि तथा नियमित भुगतान किया जाये -आंदोलनकारियों को स्वास्थ्य बीमा की सुविधा प्रदान की जाये -आंदोलनकारियों के आश्रितों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता दिया जाये -झारखंड आंदोलनकारी संग्रहालय सह स्मारक का निर्माण कराया जाये -झारखंड आंदोलनकारी आयोग का पुनर्गठन किया जाये

रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का हुआ समापन

जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में बुधवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव का समापन हुआ. इस पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन शाम को नागपुरी, संताली और जनजातीय लोकगीतों की गूंज के साथ पूरा मैदान झूम उठा. देश के विभिन्न राज्यों से आये कलाकारों ने अपने लोक संगीत और नृत्य से जनजातीय संस्कृति की विविधता का परिचय कराया. नागपुरी गायक अर्जुन लकड़ा और गायिका गरिमा एक्का ने संवाद अखड़ा मंच को संभाला. जैसे ही अर्जुन लकड़ा संवाद अखड़ा मंच पर पहुंचे, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. दर्शकों ने उनकी पसंदीदा गीतों की फरमाइश शुरू कर दी. लकड़ा ने अपने ट्रेडिंग गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को जोश से भर दिया. उनका गायकी का अंदाज और स्टेज कवरिंग शैली दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर रही थी. इसके बाद संताली गायिका कल्पना हांसदा ने अपनी मधुर आवाज में पारंपरिक व मॉडर्न गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लिया. उनके गीतों की धुन पर युवाओं ने मैदान में समूह बनाकर नृत्य किया. रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने एक-दूसरे का हाथ थाम लोकनृत्य की लय पर झूमकर ट्राइबल संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी. जनजातीय संगीत पर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग और युवा उपस्थित थे. हर गीत, हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही. युवाओं ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर इस सांस्कृतिक माहौल को कैद किया. सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आये कलाकारों ने भी अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी. संवाद अखड़ा के मंच पर इन कलाकारों ने लोकनृत्य, पुनर्जीवित रिवाजों और जनजातीय संगीत के सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम समापन की यह शाम सांस्कृतिक विविधता का उत्सव बना. लौहनगरी जमशेदपुर की धरती पर कलाकारों ने एकता और कला के नये रंग भी बिखेरा. स्टॉलों से एक करोड़ से अधिकार का हुआ कारोबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में जनजातीय व्यंजनों के स्टॉल समेत कला और हस्तशिल्प व पारंपरिक उपचार के स्टॉल्स के कई स्टॉल भी लगाये थे. जहां शहर समेत कोल्हान के विभिन्न जगहों से आये लोगों ने जमकर खरीदारी भी की. टीएसएफ के रिपोर्ट के मुताबिक इसबार संवाद-ए ट्राइबल कॉन्क्लेव में एक करोड़ से अधिक का कारोबार हुआ है. इससे यह बात साबित होती है कि जनजातीय समाज की वस्तुएं अब ब्रांड बन चुकी हैं. जिसे आदिवासी ही नहीं अन्य समाज व समुदाय के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं. संवाद फेलोशिप के लिए नौ फेलो का किया चयन टाटा स्टील फाउंडेशन ने संवाद फेलोशिप 2025 के लिए 9 फेलो के चयन की भी घोषणा की. इनका चयन 572 आवेदनों में से किया गया, जो 25 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 122 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जिनमें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों से 10 आवेदक शामिल थे. फाउंडेशन ने पिछली कई फेलोशिप परियोजनाओं के पूरा होने का भी जश्न मनाया.

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Khoboriya दिसम्बर 8, 2025 0